Thursday, 11 January, 2018

थोड़े में बहुत कुछ कहने की जिम्मेदारी है लघुकथाकार की : डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा

मित्रो,
विक्रम विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं कलानुशासक प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा का एक साक्षात्कार प्रतिष्ठित युवा लघुकथाकार श्री संतोष सुपेकर ने वर्ष 2012 में लिया था और अविराम साहित्यकी के उसी वर्ष प्रकाशित लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक डॉ. बलराम अग्रवाल) में प्रकाशित हुआ था। फेसबुक के माध्यम से आप सबके साथ हम उसे साझा कर रहे हैं।उमेश महादोषी, संपादक : अविराम साहित्यिकी

संतोष सुपेकर : सहस्रों वर्ष लम्बी लघुकथा परम्परा में इस विधा की शर्तें कमोबेश तय हो चुकने के बावजूद,डॉ. गोपाल राय द्वारा लिखित हिन्दी कहानी का इतिहास में लघुकथा को कथा-साहित्य के नौ पदों में से एक स्वीकारने जैसी उपलब्धि के बाद भी एक विधा के रूप में लघुकथा को स्थान देने या न देने के प्रश्न क्यों उठते रहते हैं?

डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा
संतोष सुपेकर
शै. कु. शर्मा : लघुकथा एक स्वतंत्र और स्वायत्त विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हमारे वृहत् जीवनानुभवों की संक्षिप्त, सुगठित किन्तु तीक्ष्ण अभिव्यक्ति का नाम लघुकथा है। यह वर्णन या विवरण के बजाय संश्लेषण में विश्वास करने वाली साहित्यिक विधा है, जिसकी परिणति प्रायः विस्फोटक होती है। बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते इस विधा ने नए-नए अनुभव क्षेत्रों और अभिव्यक्तिगत आयामों को छूते हुए अपनी विलक्षण पहचान बना ली है। शैलीगत परिमार्जन के बाद लघुकथा का स्वरूप अब और अधिक स्पष्ट और सुसंयत होता जा रहा है। ऐसे दौर में लघुकथाकारों का दायित्व भी बढ़ा है। उन्हें लघुकथा परम्परा में आए बदलावों को लक्षित कर अपनी पहचान बनानी होगी। इसके साथ सम्पादकों का भी दायित्व बनता है कि वे उन्हीं लघुकथाओं को स्थान दें, जो इसकी परम्परा को समृद्ध करती हैं। अन्यथा कमजोर लघुकथाओं के लेखन/प्रकाशन से यह प्रश्न बारम्बार उभरता रहेगा कि इसे स्वतंत्र विधा माना जाये या नहीं? कभी बिहारी के दोहों के लिए कहा गया था, ‘‘सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर।’’ यह बात आज की लघुकथाओं पर खरी उतर रही है। इसे शुभ संकेत माना जा सकता है।
संतोष सुपेकर : लघुकथा शब्द का नामकरण कब और कैसे हुआ? बीसवीं सदी के प्रारंभ में लिखी गईं लघुकथाएँ क्या लघुकथा नाम से ही प्रकाशित होती थीं?
शै. कु. शर्मा : दृष्टांत, नीति या बोध कथा के रूप में लघुकथाओं का सृजन अनेक शताब्दियों से होता आ रहा है। मूलतः दृष्टांतों के रूप में लघुकथाएँ विकसित हुईं। इस प्रकार के दृष्टांत नैतिक और धार्मिक दोनों क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं। नैतिकतापरक लघुकथाओं में हम पंचतंत्र, हितोपदेश, महाभारत, बाइबिल, जातक, ईसप आदि की कथाओं को रख सकते हैं। इसी प्रकार धार्मिक दृष्टांतों के रूप में भी देश-विदेश में लघुकथाओं के अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं। इधर आधुनिक युग में लघुकथा नामकरण काफी बिलंब से हुआ है, किन्तु यह तय बात है कि इस नए अवतार में लघुकथा ने शताब्दियों की यात्रा दशकों में तय कर ली है।
लघुकथा शब्द मूल रूप में अंग्रेजी के शार्ट स्टोरी का सीधा अनुवाद है, किन्तु इसके तौल का एक और शब्द कहानी हिन्दी में रूढ़ हो चुका है। इधर कहानी और लघुकथा-दोनों अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। लघुकथा को कहानी का सार या संक्षिप्त रूप मानना उचित नहीं होगा। लघुकथा बनावट और बुनावट में कहानी से अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व रखती है। आधुनिक काल में हिन्दी लघुकथा की शुरूआत सन् 1900 के आसपास मानी जा सकती है। माखनलाल चतुर्वेदी की बिल्ली और बुखार को पहली लघुकथा माना जा सकता है। इस श्रृंखला में माधवराव सप्रे, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद से लेकर जैनेन्द्र, अज्ञेय तक कई महत्वपूर्ण नाम जुड़ते चले गए। प्रेमचंद ने अपने सृजन के उत्कर्षकाल में कई लघुकथाएँ लिखीं, जैसे नशा, मनोवृत्ति, दो सखियाँ, जादू आदि। प्रसाद की गुदड़ी के लाल, अघोरी का मोह, करुणा की विजय, प्रलय, प्रतिमा, दुखिया, कलावती की शिक्षा आदि लघुकथा के अनूठे उदाहरण हैं। बंगला साहित्य में भी टैगोर, बनफूल ने महत्वपूर्ण लघुकथाएँ रचीं हैं। हिन्दी में सुदर्शन, रावी, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, रांगेय राघव आदि ने मार्मिक लघुकथाएँ लिखीं। बाद में इस धारा में कई और नाम जुड़ते चले गए-उपेन्द्रनाथ अश्क, हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी, नरेन्द्र कोहली, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, संजीव, शंकर पुणताम्बेकर, बलराम, डॉ. सतीशराज पुष्करणा, डॉ. सतीश दुबे, सतीश राठी, जगदीश कश्यप, डॉ. बलराम अग्रवाल, डॉ. कृष्ण कमलेश, कमल गुप्त, विक्रम सोनी, भगीरथ, रमेश बतरा, डॉ. श्यामसुंदर व्यास, पारस दासोत, सूर्यकांत नागर, कमल चोपड़ा, सुकेश साहनी, संतोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर निरंतर आदि। शुरुआती दौर में लघुकथा जैसी स्वतंत्र संज्ञा अस्तित्व में नहीं आई थी, धीरे-धीरे यह संज्ञा कहानी से बिलगाव बताने के लिए प्रचलित और स्थापित हुई है। कुछ लोगों ने लघुकथा के अतिरिक्त नई संज्ञाएं या विशेषण देने की भी कोशिश की, जैसे मिनी कहानी, मिनीकथा, कथिका, अणुकथा, कणिका, त्वरितकथा, लघुव्यंग्य आदि; लेकिन ये संज्ञाएँ पानी के बुलबुले के समान बहुत कम समय में निस्तेज हो गईं।
संतोष सुपेकर : आपने कहीं कहा है कि अतिशय स्पष्टीकरण लघुकथा की मारक क्षमता को कम करता है। अपने इस कथन के संदर्भ में लघुकथा के आकार पर प्रकाश डालें। यह भी बताएँ कि क्या रचना का कुछ भाग, जो लेखक कहना चाहता है, पाठक को सोचने के लिए छोड़ दिया जाए, अलिखित?
शै. कु. शर्मा : निश्चय ही मितकथन लघुकथा की अपनी मौलिक पहचान है। अतिशय स्पष्टीकरण या वर्णन के लिए लघुकथा में अवकाश नहीं है। आकार की दृष्टि से लघुकथा को शब्द या पृष्ठों की गणना में बाँधना संभव नहीं है। अनुभूति की सघनता, शब्दों की मितव्ययता, सुगठित बनावट और लघुता-इसे विलक्षण बनाती है। वैसे तो लघुकथा के लिए कोई सुनिश्चित फार्मूला बनाना इसके साथ अन्याय होगा, फिर भी यह तय बात है कि रचना का कुछ भाग, जो लेखक कहना चाहता है, पाठक के लिए छोड़ दिया जाए तो बेहतर होगा।
संतोष सुपेकर : ऐसा कहा गया है कि लघुकथा का शीर्षक तो दूर पहाड़ी पर बने मंदिर के समान होना चाहिए। इस संदर्भ में लघुकथा में शीर्षक की भूमिका पर अपने विचार बताएँ।
शै. कु. शर्मा : किसी भी अन्य विधा की तुलना में लघुकथा के शीर्षक की अपनी विलक्षण भूमिका होती है। कहीं यह उसके मूल मर्म को संप्रेषित करता है, तो कहीं उसके संदेश को। कहीं वह अप्रत्यक्ष रूप से लघुकथा के कथ्य का विस्तार करता है। इसका शीर्षक देना अपने आप में चुनौती भरा काम है। इसमें सर्जक से अतिरिक्त श्रम की अपेक्षा होती है।
संतोष सुपेकर : एक कथ्य, जो लघुकथा में माध्यम बनता है, कहानी में अपना प्रभाव खो देता है, आप क्या कहना चाहेंगे?
शै. कु. शर्मा : निश्चय ही किसी भी विधा या रूप का रचाव कथ्य की जरूरतों पर निर्भर करता है। इसलिए जो कथ्य लघुकथा के अनुरूप होता है, वह कहानी या किसी भी दूसरी विधा में जाकर अपना प्रभाव खो देगा।
संतोष सुपेकर : प्रेमचंद के अनुसार अतियथार्थवाद निराशा को जन्म देता है। आज की लघुकथाओं में छाया अतियथार्थवाद क्या पाठक को निराश कर रहा है?
शै. कु. शर्मा : आज की लघुकथाएँ हमारे वैविध्यपूर्ण जीवनानुभवों को मूर्त कर रही हैं। आज का पाठक सभी प्रकार की लघुकथाओं से गुजरते हुए अपनी संवेदनाओं का विकास करता है। केवल निराश होने जैसी कोई बात नहीं है।
संतोष सुपेकर : डॉ. कमल किशोर गोयनका के अनुसार लघुकथा एक लेखकहीन विधा है। क्या लघुकथाकार को हमेशा रचना में अनुपस्थित ही होना चाहिए?
शै. कु. शर्मा : लघुकथा को लेखकहीन विधा कहना उचित नहीं है। एक ही कथ्य को लघुकथा में दर्ज करने का हर लेखक का अपना ढंग होता है। श्रेष्ठ लघुकथाओं में लेखक की उपस्थिति सहज ही महसूस की जा सकती है।
संतोष सुपेकर : फ्लैश/कौंध रचनाओं (चौंकाने वाली) को कुछ विद्वान अगंभीर लघुकथा लेखन मानते हैं, जबकि कुछ इसके पक्ष में हैं। हरिशंकर परसाईं ने एक साक्षात्कार में कहा था कि लघुकथा में चरम बिंदु का महत्व होना ही चाहिए, आपकी राय?
शै. कु. शर्मा : चौंकाने वाली लघुकथाएँ भी समकालीन लघुकथा लेखन को एक खास पहचान देती हैं। इन्हें अगंभीर लेखन मानना उचित नहीं है। लघुकथा में चरम या समापन बिन्दु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इससे लघुकथा का निहितार्थ असरदार ढंग से पाठक तक पहुँचता है।
संतोष सुपेकर : लघुकथा में क्या पद्यात्मक पंक्तियों की गुंजाइश है? ऐसी आवश्यकता महसूस हो तो लेखक क्या करे?
शै. कु. शर्मा : लेखकीय आवश्यकता के अनुरूप या अन्य प्रकार के प्रयोगों के लिए लघुकथा में पर्याप्त गुंजाइश है। ये सारे प्रयोग अंततः लघुकथा की सम्प्रेषणीयता में साधन ही बन सकते हैं, यही इनकी सार्थकता है।
संतोष सुपेकर : लघुकथा को और सशक्त होने के लिए क्या आवश्यक मानते हैं- संकलनों का प्रकाशन, समीक्षा गोष्ठियों, लघुकथा सम्मेलनों का आयोजन, रचनात्मक आन्दोलन या कुछ और?
शै. कु. शर्मा : वर्तमान दौर में लघुकथाएँ बड़े पैमाने पर लिखी जा रही हैं। कुछ रचनाकार इसे बेहद आसान रास्ते के रूप में चुन रहे हैं। इसीलिए कई ऐसी रचनाएँ भी आ रही हैं, जिन्हें लघुकथा कहना उचित नहीं लगता है। वे महज हास-परिहासनुमा संवाद या किस्सों से आगे नहीं बढ़ पाती हैं। इसलिए जरूरी है कि लघुकथा सृजन की कार्यशालाएँ समय-समय पर आयोजित हों, जहाँ इस विधा से जुड़े वरिष्ठ सर्जक और विद्वान भी जुटें। श्रेष्ठ रचनात्मकता के लिए महज आंदोलनधर्मिता से कुछ नहीं हो सकता है। इसके लिए गंभीर प्रयास जरूरी हैं। लघुकथा कार्यशाला, परिसंवाद, समीक्षा गोष्ठी, सम्मेलन और प्रकाशन-इन सभी की सार्थक भूमिका हो तो बात बने।
संतोष सुपेकर : कथ्य चयन, कथ्य विकास तथा भाषा-शैली क्या कहानी की तुलना में लघुकथा में अतिरिक्त सावधानी की माँग करते हैं?
शै. कु. शर्मा : कथ्य चयन, उसका विकास और अभिव्यक्ति के उपादान-सभी दृष्टियों से लघुकथा क्षणों में बँटे जीवन के कोमल और खुरदरे यथार्थ की निर्लेप और संक्षिप्त अभिव्यक्ति होती है। इसलिए थोड़े में बहुत कहने की जिम्मेदारी एक लघुकथाकार की होती है। कहानीकार इससे मुक्त हो सकता है, लघुकथाकार नहीं।
संतोष सुपेकर : श्रेष्ठ विधा वही है जो कागज पर खत्म होने के बाद पाठक के मस्तिष्क में प्रारम्भ हो और उसे सोचने के लिए विवश करे। इस कथन के मद्देनजर विषयवस्तु का दोहराव क्या लघुकथा के विकास में बाधक बन रहा है?
शै. कु. शर्मा : निश्चय ही लघुकथा के सामने एक बड़ी चुनौती उसके दीर्घकालीन और सघन प्रभाव से जुड़ी हुई है। लघुकथाकारों को अपने अनुभव क्षेत्र को विस्तार देते हुए सृजनरत रहना चाहिए अन्यथा विषयवस्तु का दोहराव लघुकथा के विकास में बाधक बना रहेगा।
संतोष सुपेकर : हिंदी लघुकथा के भविष्य को लेकर आप क्या सोचते हैं?
शै. कु. शर्मा : किसी भी अन्य विधा की तुलना में लघुकथा का भविष्य अधिक उज्ज्वल है। समय के अभाव और जनसंचार माध्यमों के अकल्पनीय विस्तार के बीच लघुकथा के लिए पर्याप्त स्पेस अब भी बना हुआ है। इस स्पेस को पहचानकर लघुकथाकार उसका बेहतर उपयोग करेंगे, ऐसी आशा व्यर्थ न होगी।
संतोष सुपेकर : प्रतीकात्मक लघुकथाओं पर अपने विचार बताएँ?
शै. कु. शर्मा : लघुकथाओं में प्रतीकों की विशिष्ट भूमिका होती है। सार्थक प्रतीक-प्रयोग से रचनाकार अपनी रचना को देशकाल के कैनवास पर वृहत्तर परिप्रेक्ष्य दे सकता है।

संपर्क-डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा, आचार्य एवं कुलानुशासक, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन-456010 (म.प्र.)
-संतोष सुपेकर, 31, सुदामा नगर, उज्जैन (म.प्र.)

Tuesday, 26 December, 2017

डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक की याद-2 / श्याम बिहारी श्यामल

[डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक हमारे समय के महत्वपूर्ण समालोचक रहे हैं। हिन्दी लघुकथा पर उनकी दृष्टि अन्य आलोचकों की तुलना में कहीं अधिक सधी और सटीक रही है। नवें दशक में उन्होंने कुछ विचारोत्तेजक लेख लघुकथा साहित्य को प्रदान किए थे जो हमेशा ही उपयोगी रहेंगे। दिनांक 7-12-2017 की सुबह लगभग 79 साल 10 माह की उम्र में उनके निधन से हुई क्षति अपूरणीय है। हमारे विशेष अनुरोध पर उनके समग्र व्यक्तित्व को याद करते इस संस्मरण को उपलब्ध कराया है वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार भाई श्याम बिहारी श्यामल ने। इस लेख की पहली किस्त 17 दिसम्बर, 2017 को प्रस्तुत की गयी थी। आज प्रस्तुत है इसकी दूसरी यानी समापन किस्तबलराम अग्रवाल]                 
   दिनांक 17-12-2017 को प्रकाशित पोस्ट से आगे………    
हिन्दी साहित्य के मौजूदा मानचित्र या परिदृश्य से परिचित किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे सत्तर से नब्बे के दशकों के दौरान या उसके बाद भी पलामू के सांस्कृतिक जीवन-जगत में डा. व्रजकिशोर पाठक की वाग्मिता के ऐश्वर्य और रचनाशीलता के वैभव से अवगत होने का अवसर मिला हो, आज बड़े स्तर पर उनकी कहीं कोई उपस्थिति का न दिखना केवल और केवल दुखद आश्चर्य ही पैदा कर सकता है। एक ऐसा ज्ञाता जिसकी जिह्वा पर ही संस्कृत के वाल्मीकि-कालिदास ही नहीं अंग्रेजी के वडर्सवर्थ-शेक्शपीयर से लेकर हिन्दी के तुलसीदास-भारतेंदु  व प्रेमचंद-प्रसाद, मुक्तिबोध-अज्ञेय तक बसते हों ! 
श्याम बिहारी श्यामल
कॉलेज में जिस शख्स को सुनने के लिए कक्षा में साहित्येत्तर विषयों के भिन्न कक्षायी छात्र से लेकर फिजिक्स-केमेस्ट्री के प्राध्यापक तक पिछले दरवाजों से धड़धड़ाकर भर जाया करते हों और जिसके मुंह से फूटने का अवसर पाते ही शब्द दृश्यांतरित होकर अतिरिक्त अभिव्यक्ति-क्षमता के नए बल से संस्कारित हो जाते हों, ऐसे व्यक्तित्व की हमारे शब्द संसार की परिधि में एकबारगी संपूर्ण अदृश्यता आखिर क्या संकेत कर रही है ? यह स्वयं उनकी कार्य-भूमिका में किसी व्यवहारगत कमी या बेपरवाही का हश्र है अथवा हमारे साहित्य समाज की किन्हीं घनघोर बाड़ेबंदियों का दहला देने वाला सबूत?

(स्व॰) डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक

व्रजकिशोर पाठक ने लघुकथा आंदोलन के दूसरे उत्थान-काल में अस्सी के दशक के दौरान इस नव्यतर विधा की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। नौवें दशक के प्रारंभिक वर्षों में डालटनगंज से प्रकाशित कृष्णानंद कृष्ण संपादित पत्रिका 'पुन:' के बहुचर्चित लघुकथांक में सम्मिलित उनका आलेख 'हिन्दी लघुकथा का शरीर-विज्ञान और उसकी प्रसव-गाथा' न केवल उल्लेखनीय बल्कि इस विधा का ऐसा महत्वपूर्ण आधार-विश्लेषण है जिसे पढ़े बगैर कोई समीक्षक लघुकथा पर आगे बात कर ही नहीं सकता। उनकी समालोचना-शैली हिन्दी में एक ऐसे नए प्रकार का विश्लेषण रूप प्रस्तुत करती है जिसमें समीक्षकीय माप-तौल की शुष्क तराजू-बटखरी खटर-पटर के मुकाबले सृजनात्मक मनन-मंथन का मधुर मथानी-संगीत अधिक मुखर है।
वह भी एक दौर रहा जब पलामू में कोई भी रचनाकार अपनी कोई किताब छपाने को आगे बढ़ता तो सबसे पहले भूमिका लिखाने उन्हीं के पास पहुंचता। बेशक इस निमित्त दो नाम और भी सबके सामने उपलब्ध होते डा. जगदीश्वर प्रसाद और डा. चंद्रेश्वर कर्ण, लेकिन प्राय: रचनाकारों की पहली पसंद व्रजकिशोर पाठक ही होते। इसकी जो वजह अब समझ में आ रही वह है शेष दोनों आचार्यों की प्रचलित छवियां जो नए लोगों को असहज बना देती थीं। दोनों प्रथमत: से लेकर अंतत: तक आचार्य ही गोचर होते रहते। डा. जगदीश्वर प्रसाद सहज तो रहे लेकिन उनके बारे में बौद्धिक जनमानस में एक यह धारणा बहुत गहरे पैठी रही कि वह अत्यधिक बहुपठित और उद्भट विद्वान हैं। लोग उन्हें बोपदेव कहा करते। इस कारण लोग स्वयं ही आत्मसंशय का शिकार हुए रहते कि ऐसा घनघोर आचार्य भला स्थानीय स्तर के किसी नए रचनाकार को क्या तरजीह देगा !
दूसरे डा. चंदेश्वर कर्ण का तो व्यक्तित्व भी सख्त रहा। वह बहुत अधुनातन शब्दावली में लिखते और बोलने में भी एक-एक शब्द बहुत माप-जोखकर खर्च करते। अपने समकक्षीय रचनाकारों के बीच वह कभी-कभी हंसते-ठठाते भी दिख जाते लेकिन कनीय रचनाकारों के बीच उनकी संजीदगी देखते बनती। हां-हूं से शायद ही कभी आगे बढ़ते।
रचना-मूल्यांकन की उनकी मानक कसौटी ऐसी आला दर्जे की रही कि स्थानीय नयों को इससे खासा दहशत महसूस होती। अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों में ही पलामू के सुकंठ गीतकार हरिवंश प्रभात की कविताओं की किताब 'बढ़ते चरण' रामेश्वरम के असु प्रेस से छपकर आई थी। जाहिरन यह पलामू के एक नए रचनाकार की रचनाओं का संग्रह था, किसी गिरिजा कुमार माथुर या श्रीकांत वर्मा की किताब नहीं लेकिन डा. कर्ण ने इसकी बहुत कठोर समीक्षा की। उन्होंने 'बढ़ते चरण को रोको' शीर्षक से इसकी 'पलामू दर्पण' में ऐसी खबर ली कि हरिवंश प्रभात ही नहीं, दूसरे स्थानीय रचनाकार तक सहमकर रह गए थे।
दोनों के विपरीत व्रजकिशोर पाठक की आचार्य वाली छवि हमेशा गौण रही। वह हमेशा रचनात्मक आभा से भरे रहते। नए से नए रचनाकार से एकदम उसी के स्तर पर घुल-मिलकर एकाकार हो जाते। कवि आता तो उसके सामने उनका मधुर गीतकार मुखर हो उठता और गद्यकार पहुंचता तो उनका सजग कथाकार। भूमिका लिखाने पहुंचने वाले शायद ही किसी रचनाकार को उन्होंने कभी निराश लौटाया हो। साधारण से साधारण रचनाओं को भी वह खारिज नहीं करते। सौ की जगह पांच फीसद भी कुछ सप्राण तत्व होता तो वह क्षतिग्रस्त पंचान्बे को तो बेशक चिह्नित कर देते लेकिन सकारात्मक पांच की संभावनाओं को धुनकर रूई के फाहे की तरह लहराकर पेश करते।

Sunday, 17 December, 2017

डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक की याद-1 / श्याम बिहारी श्यामल

[डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक हमारे समय के महत्वपूर्ण समालोचक रहे हैं। हिन्दी लघुकथा पर उनकी दृष्टि अन्य आलोचकों की तुलना में कहीं अधिक सधी और सटीक रही है। नवें दशक में उन्होंने कुछ विचारोत्तेजक लेख लघुकथा साहित्य को प्रदान किए जो हमेशा ही उपयोगी रहेंगे। दिनांक 7-12-2017 की सुबह लगभग 79 साल 10 माह की उम्र में उनके निधन से हुई साहित्यिक क्षति अपूरणीय है। हमारे विशेष अनुरोध पर उनके समग्र व्यक्तित्व को याद करते इस संस्मरण को उपलब्ध कराया है वरिष्ठ पत्रकार और कथाकार भाई श्याम बिहारी श्यामल ने। आभार सहित प्रस्तुत है उसकी पहली किस्त--बलराम अग्रवाल]
  
(स्व॰) डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक
बिहार से अलग हुए झारखंड में गढ़वा और लातेहार के जिला बन जाने के बाद '' से पलाश, '' से लाह और '' से महुआ वाली पलामू की प्राकृतिक त्रि-उत्‍पादाधारित  पुरानी लो‍कप्रिय परिभाषा अब कितनी सार्थक रह गई है, यह अन्‍य लोगों के लिए चिंता-चिंतन या विश्‍लेषण-मनन की बात होगी, हमारे मन-मस्तिष्‍क में तो इस धरती की वह मूल पहचान आज भी कायम है जो प्राय: दो रूपों में अक्षुण्‍ण है। 
पहली तो वह कोयल नदी, जो प्रवाह रहने पर ऐसे कूकती हुई बहती है जैसे बिंधे मन व रुंधे कंठ से वन प्रांतर की कोई जल-पार्वती अपने अछोर जीवन-संघर्ष का अरुण-करुण महाकाव्‍य आलाप रही हो ! अद्भुत नदी, जो निर्जल हो जाने पर भी कभी निर्प्रवाह नहीं होती। सूख जाने पर कहीं स्‍वर्णाभ तो कहीं रजताभ विस्‍तार के रूप में गजब चमचमाने लगती है। कुछ यों जैसे उसकी कौंधें हवा पर प्रवाहित हो रहीं फेनिल राग-ध्‍वनियां हों। …और दूसरी पहचान, डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक; सतत अध्‍ययन-मनन व अपरिमित ज्ञान से रंजित जिनके बुलंद-बिंदास बोल सदा जैसे कानों के सामने ही लहराते रहते हों। जैसे गजब के अध्येता व रचनाकार वैसे ही अनोखे वक्‍ता-बोल्‍ता। जिनके मुख से जब आख्‍यान-व्‍याख्‍यान या भाषण-संभाषण फूटने लगें तो धरती से लेकर आकाश तक शब्‍द-संवेदना की जैसे उर्ध्‍व सलिला ही प्रवा‍हित होने लग जाएं। अफसोस की बात यह कि उन्‍हें वह बड़ा फलक न मिल सका जिसके वह हकदार रहे। यह हिन्‍दी साहित्‍य संसार का अपना दुर्भाग्‍य है कि वह अपनी ही एक प्रतिभा की ऐसी शख्सियत से पूरी तरह वाकिफ नहीं।
व्रजकिशोर पाठक को पहली बार देखने का संदर्भ स्‍मरण में सुस्‍पष्‍ट तो नहीं लेकिन उनकी प्रथम निकटता का आज भी कायम धड़कता अहसास यह बताने को काफी है कि मिलने के पहले से उन्‍हें काफी जान चुका था। वह निश्चित रूप से सन् उन्‍नीस सौ अस्‍सी या उससे एकाध साल पीछे का ही साल रहा होगा। आज के मेदिनीनगर और तब के डाल्‍टनगंज का वही कूकती कोयल नदी वाला तट और वहीं स्थित अपने गिरिवर हाई स्‍कूल का नाति हरित प्रांगण। वह वस्‍तुत: स्‍कूल के वार्षिकोत्‍सव जैसा ही कोई आयोजन रहा। 
श्याम बिहारी श्यामल
स्‍वप्‍नलोक की आभा महसूस होने और उस घोर पिछड़े इलाके में तब प्राय: घनघोर दुर्लभ रही बिजली के बल्‍ब-झालरों से सजा, ऊंचे पेड़ों के साए में बना मंच। ऊपर विराजमान लोगों के बीच उनके निकट होने, उनकी उठी निगाहों को आसपास महसूसते हुए काँपते पाँवों से माइक स्‍टैंड तक पहुँचने, अधपके किशोर स्‍वर में कुछ तुतले किंतु स्‍वरचित काव्‍यांश बाँचने और लौटते हुए अपने नत मस्‍तक पर उनके कुछ आशीर्वचनी शब्‍द बरसने का स्‍मरण आज भी है। वही मुख्‍य अतिथि रहे। उन्‍होंने अपनी मूल विशिष्‍टता के अनुरुप ही खूब मुखर व्‍याख्‍यान दिया था। 
शब्‍द या कथ्‍य-संदर्भ आदि तो अब ध्‍यान में नहीं, लेकिन यह पक्‍का स्‍मरण है कि उनके ठनकते बोलों ने जैसे वहाँ के मौजूद एक-एक चेतन-अचेतन या व्‍यक्ति-अव्‍यक्ति को संपूर्ण सचेतन-ससंज्ञ्य बना दिया था। कुछ यों जैसे सृष्टिकार के हाथ भी जिन हवा-झोंके, पेड़-पत्‍ते, ईंट-दीवारें व धूल-ढेलों को पंच-ज्ञानेंद्रिय-सज्जित न कर सके थे, उन्‍हें वाणी के एक जादूगर ने शब्‍दमय-ध्‍वनिमय और संवेदनापूरित कर जैसे संपूर्ण भावमग्‍न कर डाला हो। 
साढ़े तीन दशक के अंतराल के बाद आज आकलन करते हुए यह महसूस कर रहा हूँ कि बाद में बढ़ी निकटता व कुल कोई दशक भर की प्रत्‍यक्ष संपर्क-अवधि के दौरान उनसे जब-जब जहाँ कहीं भी मिलना हुआ हर संदर्श में सबसे पहले वही गिरिवर-प्रांगण वाली कहकहाती छवि सर्वप्रथम खिंचती और हर संसर्ग-संदर्भ को हमेशा-हमेशा सींचती रही। 
जीएलए कॉलेज के दिनों में स्‍वाभाविक रूप से डॉ॰ व्रजकिशोर पाठक और तत्‍कालीन हिन्‍दी विभागाध्‍यक्ष डॉ॰ जगदीश्‍वर प्रसाद से लेकर डॉ॰ चंद्रेश्‍वर कर्ण तक से कक्षाओं में सामना होता रहा लेकिन तीनों से बतौर रचनाकार सहज संपर्क बाद में विकसित हो सका। दूसरे की तुलना में शेष दो से अधिक और प्रथम अर्थात् व्रजकिशोर पाठक से तो सर्वाधिक। एक दौर ऐसा भी आया जब जिले में पटना या रांची के अखबारों के संवाददाता वाला कार्य करने के दौरान घोर समयाभाव के बावजूद उनसे प्रतिदिन मिलने का क्रम चलता रहा। 
दिन भर की लाख भाग-दौड़ के बावजूद डालटनगंज के बाजार-क्षेत्र में अखबारी साथियों के बीच से शाम होते अचानक गायब हो जाना और वहीं से पाँव-पैदल छहमुहान-बस स्‍टैंड-कचहरी होते चर्च के सामने से गुजर रेललाइन पार करके रेड़मा और अंतत: ढाई-तीन किलोमीटर की दूरी के बाद चरकी भट्ठा के पास उनके घर। अक्‍सर उनके घर के बाहर छोटे-से कैंपस के भीतर ही बैठकी जमती। कभी-कभी मेरे साथ हृदयानंद मिश्र या रामाशीष पांडेय जैसे तब के युवा नेताओं में से भी कोई न कोई खिंचा पहुँच जाता। 
साहित्‍य या समाज के अप्रचलित विषय-संदर्भों पर लंबी खिंचती चर्चा साथ गए व्‍यक्ति को कभी-कभी बहुत भारी भी पड़ने लगती लेकिन डाक्‍टर साहब की रोचक शैली एकबारगी उसे भाग खड़े होने से भी बचाए चलती। नीचे इधर-उधर अनियोजित घास। अंधेरे में इससे उत्‍साह के साथ निकलते और टूटते मच्‍छरों से भरसक बचने के लिए काठ की चौड़ी कुर्सी पर दोनों पाँव ऊपर ही समेटकर बैठना-बतियाना होता। 
कुछ तो खबरिया पेशे का आवारा सूखापन और कुछ हमारी आदतन गाफिली ऐसी कि हम पर अक्‍सर फांकाकशी धूल-गर्द की तरह उड़ती-झझराती रहती। इसका अहसास श्रीमती पाठक को शायद अच्‍छी तरह था। डाक्‍टर साहब तो जिस विषय पर शुरू हो जाते उसे भारतीय फलक से उठाकर देखते ही देखते विश्‍व साहित्‍य के आकाश तक उड़ा ले जाते। ऐसे समय उनके अध्‍ययन-विश्‍लेषण बल का विस्‍मयकारी अहसास होता। हम आदिकवि वाल्‍मीकि की करुणा से महाकवि गोस्‍वामी तुलसीदास, कालिदास, केशव, भारतेंदु, प्रेमचंद, प्रसाद, निराला, मुक्तिबोध,अज्ञेय और उधर टीएस इलियट, वर्ड्सवर्थ से लेकर एजरा पाउंड व शेक्‍सपीयर या टाल्‍सटाय तक जैसे रचनाकारों के रचना-कौशल या सृजन-संदर्भों के किसी न किसी आयाम से प्राय: प्रतिदिन अवगत-चमत्‍कृत होते चलते। 

डॉ॰ पाठक अक्‍सर अपने गुरुदेव डॉ॰ रामखेलावन पांडेय की किसी न किसी रूप में चर्चा लगभग रोज करते। कभी उनके 'हिंदी साहित्‍य के नया इतिहास' को लेकर, रामचंद्र शुक्‍ल से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तक के साथ उनकी इतिहास-दृष्टि के भेद का संदर्भ तो कभी हिन्‍दी के विभिन्‍न बड़े समकक्षीय रचनाकारों के साथ उनके मतभेद-विवाद के संदर्भ। गजब दक्षता के साथ वह बात को बात से जोड़ते चले जाते। उनसे कुछ ही घंटों का बतियाना दर्जनों ग्रंथों के बहुविध संदर्भ से जोड़ देता। उनके लंबे अध्‍ययन-मंथन का दुर्लभ अर्क सहज ही जिह्वा तक आ पहुँचने का तृप्ति-सुख।
हाथ आए विषय को वह लगातार ईख की तरह ऐसा पेरते चले जाते और घंटों अथक मथते-फेंटते रह जाते कि पूरा वातावरण मीठी तरलता से छलछलाता रह जाता लेकिन गले के नीचे तृप्ति तभी उतरती जब भाप छोड़ते भरे हुए प्‍लेट हाथ आते। आलू के पतले-लंबे पीले तताए टुकड़े, चूड़े के ललाए कुरकुरे दाने और हरी मिर्च के साथ उसके गल जाने तक खूब भुने प्‍याज के करियाये लरजे सोंधाई छोड़ते क्षीण हिस्‍से। इन सबसे उठता सोंधाई से भरा आह्लाद जगाता स्‍वाद। मात्रा कभी कामचलाऊ नहीं, हमेशा भरपूर। इसके साथ ही लगे हाथ स्‍टील के परिपक्‍व गिलास में पौन ऊंचाई तक ऊपर पहुँची-झाँकती गाढ़े दूध की ललौहीं चाय। उनकी चर्चा को मुक्तिबोध के 'अंधेरे में' से निकलकर चूड़े की सोंधाई व चाय की सांद्रता के शास्‍त्र में प्रविष्‍ट होने में पल भर की भी देर नहीं लगती। गजब यह कि हल्‍के से हल्‍के लगने वाले विषय के संदर्भ को संतृप्‍त करने के लिए वह कभी 'गोदान' से दृष्‍टांत खींच लाते तो कभी 'नदी के द्वीप' या 'शेखर एक जीवनी से'
सबसे खास होता निशा काल में बैठकी की समाप्ति का रूप। साथ में किसी और के आए होने पर तो नहीं लेकिन जिस दिन मैं उनके यहाँ अकेला पहुँचा रहता उस दिन गजब हो जाता। लाख मना करने और श्रीमती पाठक के टोकने के बावजूद डाक्‍टर साहब कमीज डालकर मुझे विदा करने साथ निकल लेते। शाम से ही शुरू चर्चा अविराम अपने नए-नए अध्‍याय बदलती रहती। उनका बाेलना, बोलते चला जाना और मेरा पूछना व सवाल उठाते रहना अबाध। इसी के समानांतर चरकी भट्ठा से निकलकर हमदोनों का कभी छोटे तो कभी बड़े डगों के साथ रेलवे क्रॉसिंग की ओर बढ़ना भी जारी। डेढ़-दो किलोमीटर चलकर जब हम रेल लाइन को लांघ आरा मिल के पास पहुँचते तो डॉक्‍टर साहब मुझे विदा कहकर लौटने लगते। 
इसके बाद मैं उन्‍हें विदा करने को कहकर उनके साथ हो लेता। चर्चा चलती रहती और मैं एक किलोमीटर चलकर उन्‍हें रेड़मा चौराहे पर छोड़कर लौट पड़ता। तब तक जारी चर्चा के खत्‍म न होने का हवाला देकर डॉक्‍टर साहब फिर मुझे रेल लाइन तक छोड़ने लौट चलते। इसके बाद भी अक्‍सर फिर मैं पीछे मुड़कर उनके साथ। कहाँ कुर्सी से उठते हुए बैठकी की समाप्ति की घोषणा का समय रात के दस या ग्‍यारह बजे का और कहाँ परस्‍पर एक-दूसरे को छोड़ने के पथ-परिक्रमा के क्रम में घड़ी की सुइयाँ डेढ़-दो को छूती हुई भोर की ओर इशारा करने लग जातीं। बड़ी मुश्किल से बिलगाव होता। दूसरे दिन की बैठकी की शुरुआत में ही बीती रात का विलंब न दोहराने का संकल्‍प लिया जाता लेकिन यह शायद ही कभी एक बार भी पूरा हो सका हो। 
वह पढ़ाकू ऐसे कि साहित्‍य ही क्‍यों इतिहास-भूगोल, बाग-बगवानी, प्रदूषण-पर्यावरण से लेकर साइंस-अर्थशास्‍त्र आदि तक किसी विषय-संदर्भ की कोई पोथी शाम को पकड़ा आइए और दूसरे दिन सुन लीजिए पृष्‍ठांक संदर्भ के साथ उसकी संपूर्ण सप्रसंग व्‍याख्‍या। सुनने वाला अरुचिकर-अनपेक्षित विषय होने के नाते कभी शुरू में भले कुछ कसमस करता हुआ भी लग जाए लेकिन कुछ ही देर में उस पर उनकी सरस वाणी के जादू का चल जाना व रस-रंग में डूबकर उसका डोलता दिखना भी तय। कविता और उपन्‍यास से लेकर आलोचना तक में उनकी दुर्लभ लेखन-प्रतिभा की एक से एक बानगी। 
इमर्जेंसी के दौर की उनकी कविता 'लंगड़े कुत्‍ते का भाषण' गजब की रचना है जिसमें विकलांग कर दी गई चेतना का प्रतीक बनकर पेश लंगड़ा कुत्‍ता देश की तत्‍कालीन परिस्थितियों को रेखांकित करता हुआ कहता है कि देश में सारे पुल्लिंग शब्‍द स्‍त्रीलिंग हो गए हैं! पी.एच.डी. के लिए साठ के दशक में तैयार उनका शोधग्रंथ 'भारतेंदु की गद्य-भाषा' न केवल आज पेश हो रहे ज्‍यादातर डी.लिट. प्रबंधों पर भारी है बल्कि हिन्‍दी भाषा-साहित्‍य के जनक बाबू हरिश्‍चंद्र के मूल्‍यवान लेखन पर प्रारंभिक गंभीर व्‍याख्‍या-कार्य के रूप में अत्‍यंत वरेण्‍य योगदान भी। 
उन्‍होंने बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद की शोध-पत्रिका में अनेक ऐसे रचनाकारों पर गंभीर पड़ताली आलोचना लिखी है जिन्‍हें अचर्चा की धूल ने युगों-युगों से ढंक रखा था। इस क्रम में बाबू भोलाराम गहमरी पर लिखा विशिष्‍ट शोध आलेख और कवि बोधिदास के भूले-बिसरे काव्‍यग्रंथ 'झूलना' पर किया गया उनका पड़ताली कार्य तो तत्‍काल स्‍मरण में कौंध रहा है। 'हिन्‍दी साहित्‍य के अचर्चित पृष्‍ठ' स्‍तंभ-नाम के साथ छपे उनके ऐसे सारे लेखों को तत्‍काल संकलित किए जाने की आवश्‍यकता है लेकिन यह सब कुछ खोजना और समुचित क्रम-संदर्भादि का निरुपण करते हुए प्रसंगों को खोलते-जोड़ते हुए इंट्रो नोट या पाद टिप्‍पणियों के साथ प्रभावशाली ग्रंथ-प्रस्‍तुति संभव बनाना साहित्‍य के ही किसी श्रमशील अनुरागी के योगदान से संभव है। 
उन्‍होंने मगही में भी काफी कुछ लिखा है। उनका उपन्‍यास 'गांजा बाबा' तब  काफी चर्चे में रहा। यह अपनी भाषा और कहन की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण कृति है किंतु हिन्‍दी की मूल रचना न होने के कारण स्‍वाभाविक रूप से बड़े फलक के अपेक्षित विमर्श या स्‍वीकृति-लाभ से वंचित। उसी तरह मगही में ही उनकी 'मेयादी बोखार' रचना का भी मुझे स्‍मरण है जिसका जब वह स्‍वयं वाचन करते तो एक-एक शब्‍द जैसे अग्नि-कणों की तरह दृश्‍यांश बिच्‍छुरित करते चले जाते। 1988 में मेरे पलामू छूटने के बाद भी डाक्‍टर साहब ने काफी कुछ काम किया है। इसी क्रम में पलामू के अमर शहीदों पर लिखी उनकी कृति 'नीलांबर पीतांबर' खास है। आवश्‍यकता इस बात की है कि उनके समूचे लेखन-कार्य को गंभीरतापूर्वक अनुक्रमित और संपादित कर समग्र रचनावली-रूप में प्रकाशित कराया जाए।
                                                                              समापन किस्त आगामी अंक में………    

Tuesday, 14 November, 2017

पंजाबी कथाकार गुरदीप सिंह पुरी की लघुकथाएँ

सारे जहां से अच्छा
इस बार पंचकुला में आयोजित 26 वें अन्तरराज्यीय लघुकथा सम्मेलन में डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति की ओर से जो सामग्री बाँटी गयी उनमें गुरदीप सिंह पुरी के पंजाबी लघुकथा संग्रह ‘सारे जहां से अच्छा’ (1998) का हिन्दी रूपान्तर भी शामिल था। इसका रूपान्तर किया है श्री के॰ एल॰ गर्ग ने और भूमिका प्रि॰ दलीप सिंह भूपाल व डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति ने लिखी है। यहाँ पेश हैं उस संग्रह से तीन लघुकथाएँ :

पहली बार रोये
एक मुहल्ले के लोगों को अपने मुहल्ले में गुरुद्वारा बनाने का चाव चढ़ा।
उन्होंने घर-घर जाकर धन इकट्ठा किया और एक निहायत खूबसूरत गुरुद्वारे का निर्माण कर लिया। नाम रखा—श्री कलगीधर गुरुद्वारा।
पहला साल अच्छा व्यतीत हुआ।
अगले वर्ष गुरुद्वारा कमेटी चुनाव में मुहल्ले के दो धड़े बन गये।
अलग हुए धड़े ने अपना नया गुरुद्वारा खड़ा कर लिया। सोच-सोच कर नाम रखा—गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी।
अब हर कार्यक्रम के वक्त इस गुरुद्वारे की कमेटी गुरु-घर के बाहर खड़ी होकर ‘कलगीधर गुरुद्वारे’ जाने वाली संगत को रोककर रोष से कहती है :
 “तुम्हें शर्म आनी चाहिए। बाप का घर छोड़कर पुत्तर के दर पे जाते हो! घोर बेअदबी!”
पिता-पुत्र अपने सिक्खों पर पहली बार धाहें मार-मार कर रोए।

बोझा
“यार, जब से यह नयी कमेटी आयी है न, ससुरों ने गुरु-घर में सुधार-लहर ही चला दी है!” गुरु-घर के ग्रंथी सिंह ने बड़े दु:खी स्वर में कहा।
“वह कैसे?” दूसरे गुरु-घर के ग्रंथी ने गुरु-भाई से हैरानी से पूछा।
“देखो न—नयी गुल्लक धर दी है! इसमें न चिमटी पड़ती है और न ही गोंद वाला डक्का। अब ये छोटी-छोटी हरकतों पे उतर आये हैं। रात के अखंड-पाठ की माया भी गुल्लक में डाल देते हैं।”
“हूवर (वेक्यूम मशीन) चला लिया कर न! ऐसे मन क्यों मैला करता है।”
सुनते ही पहले ग्रंथी के सिर से मनों बोझा उतर गया।

बूढ़ी भिखारन
“बेटा, सुबह का कुछ नहीं खाया। भगवान के नाम पर रोटी दे दे! भगवान तुझे लम्बी उम्र दे। तेरी कुल ऊँची हो। तेरा आँगन खुशियों से भर जाये।” बूढ़ी भिखारन ने दफ्तर के लॉन में बैठे बाबू को रोटी वाला डिब्बा खोलते देख मिन्नत-सी की।
बाबू ने डिब्बा खोला तो उसमें पहले की तरह तीन रोटियाँ ही थीं, जिनसे बाबू का ही पेट मुश्किल से भरता था।
उसने दो रोटियों पर थोड़ी-सी सब्जी रखकर बुढ़िया की तरफ बढ़ा दी।
बूढ़ी के थिरकते होठों से बस यही निकला :
“बेटा, रोटियाँ तो तीन ही हैं! आप खा लो। मेरा क्या है, मैं कहीं और से माँग लूँगी। कहीं आप भूखे रह गये तो… ”
बुढ़िया लाठी टेकते आगे सरक गयी। बाबू कितनी ही देर अपने आँसू ठेलने की कोशिश करता रहा।


गुरदीप सिंह पुरी  की अन्य कृतियाँ :
कहानी संग्रह
1 उदासे फुल बहारां दे (1981)
2 ख्वाहिश (1990)
3 इक रात दा कत्ल (1990)
मिन्नी कहानी संकलन का संपादन
गुआचे दिनां दी भाल (1992)
मुलाकातें
बिन तुसां असी सखने (1985)
काव्य संग्रह
सखने हथ (1994)
निवास  का पता : 73-मैडक्नि स्ट्रीट, 3-एल, व्हाइट इंच, ग्लासगो जी-149 आर॰ टी॰ (यू॰ के॰)