Tuesday 14 November 2017

पंजाबी कथाकार गुरदीप सिंह पुरी की लघुकथाएँ

सारे जहां से अच्छा
इस बार पंचकुला में आयोजित 26 वें अन्तरराज्यीय लघुकथा सम्मेलन में डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति की ओर से जो सामग्री बाँटी गयी उनमें गुरदीप सिंह पुरी के पंजाबी लघुकथा संग्रह ‘सारे जहां से अच्छा’ (1998) का हिन्दी रूपान्तर भी शामिल था। इसका रूपान्तर किया है श्री के॰ एल॰ गर्ग ने और भूमिका प्रि॰ दलीप सिंह भूपाल व डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति ने लिखी है। यहाँ पेश हैं उस संग्रह से तीन लघुकथाएँ :

पहली बार रोये
एक मुहल्ले के लोगों को अपने मुहल्ले में गुरुद्वारा बनाने का चाव चढ़ा।
उन्होंने घर-घर जाकर धन इकट्ठा किया और एक निहायत खूबसूरत गुरुद्वारे का निर्माण कर लिया। नाम रखा—श्री कलगीधर गुरुद्वारा।
पहला साल अच्छा व्यतीत हुआ।
अगले वर्ष गुरुद्वारा कमेटी चुनाव में मुहल्ले के दो धड़े बन गये।
अलग हुए धड़े ने अपना नया गुरुद्वारा खड़ा कर लिया। सोच-सोच कर नाम रखा—गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी।
अब हर कार्यक्रम के वक्त इस गुरुद्वारे की कमेटी गुरु-घर के बाहर खड़ी होकर ‘कलगीधर गुरुद्वारे’ जाने वाली संगत को रोककर रोष से कहती है :
 “तुम्हें शर्म आनी चाहिए। बाप का घर छोड़कर पुत्तर के दर पे जाते हो! घोर बेअदबी!”
पिता-पुत्र अपने सिक्खों पर पहली बार धाहें मार-मार कर रोए।

बोझा
“यार, जब से यह नयी कमेटी आयी है न, ससुरों ने गुरु-घर में सुधार-लहर ही चला दी है!” गुरु-घर के ग्रंथी सिंह ने बड़े दु:खी स्वर में कहा।
“वह कैसे?” दूसरे गुरु-घर के ग्रंथी ने गुरु-भाई से हैरानी से पूछा।
“देखो न—नयी गुल्लक धर दी है! इसमें न चिमटी पड़ती है और न ही गोंद वाला डक्का। अब ये छोटी-छोटी हरकतों पे उतर आये हैं। रात के अखंड-पाठ की माया भी गुल्लक में डाल देते हैं।”
“हूवर (वेक्यूम मशीन) चला लिया कर न! ऐसे मन क्यों मैला करता है।”
सुनते ही पहले ग्रंथी के सिर से मनों बोझा उतर गया।

बूढ़ी भिखारन
“बेटा, सुबह का कुछ नहीं खाया। भगवान के नाम पर रोटी दे दे! भगवान तुझे लम्बी उम्र दे। तेरी कुल ऊँची हो। तेरा आँगन खुशियों से भर जाये।” बूढ़ी भिखारन ने दफ्तर के लॉन में बैठे बाबू को रोटी वाला डिब्बा खोलते देख मिन्नत-सी की।
बाबू ने डिब्बा खोला तो उसमें पहले की तरह तीन रोटियाँ ही थीं, जिनसे बाबू का ही पेट मुश्किल से भरता था।
उसने दो रोटियों पर थोड़ी-सी सब्जी रखकर बुढ़िया की तरफ बढ़ा दी।
बूढ़ी के थिरकते होठों से बस यही निकला :
“बेटा, रोटियाँ तो तीन ही हैं! आप खा लो। मेरा क्या है, मैं कहीं और से माँग लूँगी। कहीं आप भूखे रह गये तो… ”
बुढ़िया लाठी टेकते आगे सरक गयी। बाबू कितनी ही देर अपने आँसू ठेलने की कोशिश करता रहा।


गुरदीप सिंह पुरी  की अन्य कृतियाँ :
कहानी संग्रह
1 उदासे फुल बहारां दे (1981)
2 ख्वाहिश (1990)
3 इक रात दा कत्ल (1990)
मिन्नी कहानी संकलन का संपादन
गुआचे दिनां दी भाल (1992)
मुलाकातें
बिन तुसां असी सखने (1985)
काव्य संग्रह
सखने हथ (1994)
निवास  का पता : 73-मैडक्नि स्ट्रीट, 3-एल, व्हाइट इंच, ग्लासगो जी-149 आर॰ टी॰ (यू॰ के॰)

Friday 10 November 2017

डॉ॰ सतीश दुबे को याद करते हुए

न हन्यते हन्यमाने शरीरे

गत एक वर्ष मन लगातार उद्विग्न रहा है; और 25-26 अक्टूबर के बाद तो कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब अन्दर ही अन्दर आँसू लगातार न झरे हों।
लघुकथा लेखन ने जो बृहद् परिवार दिया है, उसमें से किसी का भी चले जाना मस्तिष्क को हिला जाता है, ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ को जानते हुए भी।
डॉ सतीश दुबे
जीवन में कई बार ऐसा घटित होता जाता है कि मस्तिष्क जो कहता है, मन उसे स्वीकार नहीं करता, तर्क पर तर्क देता हुआ अपनी बात मनवाता रहता है। गत 25 दिसम्बर, 2016 से अब तक यह लगातार हुआ है। इनके सन्दर्भ में राम-नाम के सत्य को मन स्वीकार नहीं कर रहा है। 
उम्र में और लेखन में भी, बहुत वरिष्ठ होने के बावजूद उनका सम्बोधन ‘आप’ ही रहता था। कई सालों से प्रत्येक नवरात्र की नवमी तिथि को मैं उन्हें फोन किया करता था। एक बार नवमी के बजाय दशहरे की शाम को किया तो उधर से बोले—“हाँ, मैं कल आपके फोन का इन्तजार करता रहा। अब सोच ही रहा था कि आज तो आपका फोन जरूर आएगा।” लेकिन विडम्बना देखिए कि इस साल (मार्च-अप्रैल 2017 में पड़े) चैत्र नवरात्र की नवमी भी खाली गयी और सितम्बर 2017 में पड़े शारदीय नवरात्र की नवमी भी। ऐसा नहीं कि भूल गया था; याद रहा, इस बार तो हर बार से ज्यादा याद आया, लेकिन फोन की ओर हाथ बढ़ाने की, नम्बर डायल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
सुरेश शर्मा जी
रोना ऐसा भी होता है, सच कहूँ, पहली बार जाना। आँसू अब से पहले भी भीतर गिरते रहे हैं, लेकिन अब से पहले इतनी गहराई से महसूस नहीं किया था।
इन्होंने ही सुरेश शर्मा जी के चले जाने की सूचना फोन पर दी थी। संयोग से उस समय नासिक में था और त्र्यम्बकेश्वर दर्शन की ओर मेरा मुख था। शायद इसीलिए शर्मा जी के प्रति मन अनजानी श्रद्धा से भर गया था। त्र्यम्बकेश्वर महादेव के प्रांगण में बैठकर कुछ समय सुरेश शर्मा जी की ओर से जाप किया था। तब से, जब भी देव-दर्शन का संयोग बनता है, सुरेश शर्मा जी मेरी स्मृति में आ जाते हैं। जैसे मैं अपने पिताजी-चाचाजी की ओर से मंत्र जाप करता हूँ, सुरेश शर्मा जी की ओर से भी करता हूँ। उस कड़ी में अब ये भी आ जुड़े हैं। सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी आ जुड़ेंगे।
गत 1 नवम्बर, 2016 को मेरे मोबाइल पर संदेश आया—‘जन्मदिन मुबारक हो।’ मैंने तुरन्त फोन किया—“प्रणाम भाईसाहब, अभी से?”
बोले, “हाँ।”
“लेकिन मुझसे पहले तो आपका जन्मदिन पड़ेगा?”
बोले, “बलराम भाई, पहले-बाद का मसला ही नहीं है। यह पूरा माह हमारा है। इसलिए पहले ही संदेश भेज दिया कि कहीं आप बाजी न मार लें।”
‘कोई दूसरा बाजी न मार ले’ की स्पर्द्धात्मक भावना का यह स्नेह-पक्ष था। उसके बाद तो 12 नवम्बर को भी बात हुई, 26 नवम्बर को भी और एक बार सम्भवत: दिसम्बर के पहले-दूसरे सप्ताह में भी। इतनी जल्दी-जल्दी वार्तालाप के बीच से संवादकर्ता का उठकर अनायास चले जाना कचोटता है। आखिर हुआ क्या? भरे-पूरे परिवार को, हँसती-खिलती महफिल को एकाएक भौंचक कर, बिना कुछ बताए क्यों चले गये?
लेकिन, यह शिकायत करें किससे? पूछें किससे?
इन सवालों के बावजूद हम निश्चिन्त हैं। क्यों? इसलिए कि हमारा विश्वास जैसे ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ में है, वैसे ही ‘ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ में भी है; और ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ में तो अटूट है। ‘न हन्यते’ के रूप में उनका लेखन हमारे बीच मौजूद है, मौजूद रहेगा।
मन है कि उनके इस मौन को उनकी कुछ लघुकथाओं के माध्यम से तोड़ू; लेकिन इस समय नहीं। यह जिम्मेदारी उठाने की स्वस्थ मन:स्थिति में नहीं हूँ। यह समय उनकी स्मृति को नमन करने का है। 12 नवम्बर का इन्तजार मुझ पर बहुत भारी पड़ रहा है, इसलिए आज ही इस पोस्ट को डाल देने को विवश हूँ। मित्रगण क्षमा करें।                                                                –बलराम अग्रवाल   

Saturday 4 November 2017

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… चौथी कड़ी

नजदीक की दूरी /  सतविन्द्र कुमार राणा                                                               
सतविन्द्र कुमार राणा
काम से घर लौटते हुए गली में ही गर्म तेल की महक महसूस हुई। घर में घुसते ही अपने ही घर के चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ी दिखी। अनुमान लगाना मुश्किल न था, किसी का जन्मदिन अथवा सालगिरह होगीतभी ऐसा होता है। अक्ल के घोड़े दौड़ाना शुरु ही किये थे कि पिताजी की आहट सुनाई दी।
"पापा जी सालगिरह मुबारक होआज आपकी और मम्मी जी की शादी  सालगिरह है न?" मंझली बहू धीरे-से बोली।
"आँ...हाँ..हाँग्यारह मई हैआज ही।याद करते हुए बोले।
"बहूइसको क्या ध्यान रहना थाकभी ये चोंचले किये ही नहीं।"
 माँ की शिकायत में तंज था।
दूसरी बहू ने छेड़ा, "पापा जी को नया फोन मिलेगा आज तो गिफ्ट में।"
पिता जी धीमे-से मुस्कुराए।
छः बेटों के किसान पिता। सब बच्चे अब बाप बन चुके थे। छः कमरे का मकानसंयुक्त परिवार का घर था।
चाय के साथ सब ने पकौड़े खाए। सबने उन्हें सालगिरह की बधाई दी। पिताजी को सस्ता-सा नया फोन मिलाजिसे वे आसानी से चला सकते थे।
चलने के लिए उठे तो माँ ने टोका, "कहाँ चल दिए अब?"
पिता जी झट से बोले, "वहीँ जो बरसों से मेरा ठिकाना हैतबेले के साथ वाला कोठड़ा।"
अब माँ चुप थी।
पिताजी आगे बोले, "तू सँभाल अपने पोते-पोतियों को और मैं सँभालूँ भैंसों को।"
दोनों के होठों पर मुस्कान और आँखों में  विवशता झलक रही थी।
पिता जी चले गए।
माँ बड़बड़ा रही थी ,"बड़े परिवार में बड़े पास रहते हैंपर एक साथ नहीं।"
                                  
 मौन शब्द  /  विभा रश्मि
विभा रश्मि
"सुनो ! दोनों में नोक-झोंक चल रही है। आज सुबह से बहू-बेटे में रूठना-मनाना जारी है।"
घबरा कर अधेड़ पत्नी अपने पति से बोली।
"सुनो! उनके बेडरूम से तेज़ आवाजें आ रही हैखूब झगड़ रहे है।"
"क्योंक्या हुआ?" पति का स्वर चिन्तित था।
"शिकायत चल रही हैदो साल हो गये शादी कोबहू ने न जाने कितनी बार हमारे बेटे से प्यार का इज़हार किया। पर हमारे बेटे ने ‘वे शब्द’ नहीं बोले पलट केजो आजकल बोलने का बहुत फ़ैशन हो गया है।"
"क्या नहीं बोलकौन-से शब्द?" पति का सवाल था।
"वोही···…।" पत्नी के नेत्रों में इस उम्र में भी रंगीन बल्बों की लड़ियाँ जल उठी थीं।
"अच्छा…अच्छा··· ।" पति समझ गया।
उसे लगा पत्नी कहीं वे 'खास शब्दबोल न पड़े। आगे बढ़ कर उसने अधेड़ पत्नी की मुलायम हथेली अपनी दोनों हथेलियों में कैद कर उसे चुप करा दिया और उसे असीम प्यार से तकता रहा।
                         
 दूसरे की माँ /  सीमा जैन
सीमा जैन
"अजब इंसान है तू! तुझमें थोड़ी-बहुत इंसानियत भी बची है या नही? …तुझे अपनी अपाहिज़बीमार माँ से मंदिर और पूजा की ज़्यादा चिंता है। माँ का ज़रा भी ख़्याल नही…?" मेरा दोस्त श्याम एक साँस में सब कुछ कह गया।
 मैंने थकी-सी आवाज़ में कहा,  "माँ की चिंता है तभी तो एक पुजारी का इंतज़ाम करने के लिए भटक रहा हूँ। जो मेरे पीछे त्यौहार के समय मंदिर को संभाल ले।” फिर अपने आँसू पीते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई, “ ये मंदिर की नौकरी ही तो हमारी रोज़ी-रोटी है। ये चली गई तो मैं माँ के साथ सड़क पर आ जाऊँगा…मुझे अपने कैंसर के इलाज़ के लिए शहर जाना है।”
दोस्त को सोच में पड़ा देख उसने आगे कहा, “और ये सलाह माँ ने ही दी है दोस्त कि कोई मंदिर संभालने को मिल जाये तो तू शहर चला जा…एक बार नंबर चला गया तो फिर पता नही कब लगे?
“हाँ यार, ये समस्या तो है। तुम अकेले ही हो माँ की देखभाल करने वाले।” श्याम बोला।
 “…और यदि मैं भी न रहा तो..."
श्याम ने मुझे रोककर मेरा हाथ थाम लिया, "तुम चिंता न करो, मैं घर और मंदिर दोनों संभाल लूंगा…हमारे मंदिर को पिताजी देख लेंगें।"
मैंने खुश होते हुए कहा, "अपनी माँ को तो सभी संभालते  हैं, पर दूसरों की माँ को संभालने वाले बहुत कम हैं। तुमने मेरा बहुत बड़ा बोझ उतार दिया श्याम।"
एक दर्द भरी मुस्कान के साथ वह बोला- "अब तो अपनी माँ को संभालने वाले भी कम हो रहे हैं दोस्त!"

खमियाजा / पवित्रा अग्रवाल
अरे यार बंसल, बहुत दिनों बाद मिले होकैसे होबच्चे कहाँ हैं?”
पवित्रा अग्रवाल
एक बेटा कनाडा में है और एक अमेरिका में।”
तो क्या तुम और भाभी यहाँ अकेले हो?”
हाँ गुप्ता, अब तो अकेले ही हैं और लगता है मरते दम तक अकेले ही रहेंगे।”
अरे ऐसा क्यों सोचते हो…चल सामने के रेस्त्रां में बैठ कर चाय पीते है।”
रेस्टोरेंट में चाय का इंतजार करते गुप्ता को  बंसल से हुए एक पुराने  वार्तालाप की याद आ गई।  उसने कहा था –‘अरे गुप्ता  तू तो पूरा कंजूस हैइतना पैसा होते हुए भी बच्चों का कैरियर बनाने में पीछे रह गया। मेरे पास तो इतने साधन भी नहीं थे, फिर भी पेट काट कर दोनों लड़कों को इंजीनियर बनाया है। दोनों को बड़ा अच्छा पैकेज मिला है। अब चैन से हूँ। बस दोनों की शादी और हो जायेअच्छी संस्कारी बहुएँ आ जायें तो जिंदगी आराम से कटे।’
            उसने कहा था ‘अरे यार, बेटे तभी तक अपने हैं जब तक शादी  नहीं होती।
चाय आने के साथ ही उसका ध्यान भंग हुआ। बंसल ने पूछा, “तुम्हारे बच्चे कैसे हैंकहाँ हैं?”
        “यहीं हैं हमारे साथ। मैंने तो  ग्रेजुएशन करा के बाईस की उम्र में दोनों की  शादी  कर दी थी । घर के व्यापार में लगे  हैं तो  भाग कर भी कहाँ जायेंगे?...लोग  मुझे हमेशा कंजूस कहते रहे क्योंकि  मैंने बच्चों को डाक्टरइंजिनियर नहीं बनाया। पर अब लगता है कि अच्छा ही किया…ज्यादा पढ़ाता तो कैरियर की तलाश में हमें छोड़ कर कहीं  दूर जा बैठते। फिर इतने बड़े व्यापार का मैं क्या करता?...अब दुःख तकलीफ में हम एक दूसरे के साथ  तो हैं।
       “शायद तुम ठीक ही कह रहे हो। मुझे भी अब  यही  लगता है... बच्चो को ऊँची शिक्षा दिलाने का खमियाजा  तो भुगतना ही पड़ेगा।
                                   
 बेबसी / लता अग्रवाल
लता अग्रवाल
आ ! ले ! ले !” रात के समय तीन आवारा अय्याश सड़क पर बैठी उस पगली को खाने का पैकेट दिखा कर अपनी ओर बुला रहे थे।
खाने के पैकेट के प्रति पगली की लालसा देखकर लगता था उसने काफी समय से कुछ नहीं खाया था। वह उनके पीछे- पीछे उस अँधेरे की और चल दी।
अपनी भूख शांत करने के लिए वह ओरों की भूख का शिकार हो गई।


अंडेवाला /  शोभा रस्तोगी
शोभा रस्तोगी
नुक्कड़ पर रेहड़ी लगाके दुबला और गँवार-सा आदमी अंडे बेचता है। एक के ऊपर एक कई एग-ट्रे रखी हैं | साथ ही गर्म तवा भीजिस पर आमलेट बनता है। कुछ छुटपुट सामान भी। मैं अंडे लेने उसकी रेहड़ी पर पहुँची ही हूँ। चार अंडों का ऑर्डर दिया है। यकायक मेरी तीन साला बेटी मेरा हाथ छुड़ाकर तिरछी-सी झुक गई है। मैं हैरान! तभी देखती हूँ कि अंडेवाले के सिकुड़े से मुंह पर अर्थपूर्ण  मुस्कान फ़िसल आई है जो मुझे बिल्कुल नागवार गुजरी। मैं परेशान और ये… मुस्कान ?  मैं उसे बिना कुछ बोले थोड़ा-सा झुकती हूँ । अब आश्चर्यमिश्रित मुस्कान की बारी मेरी है | रेहड़ी के दोनों पहियों पर लम्बवत्लकडी का एकफट्टा बिछा है। उसपर एक तरफ़ डलिया है जो शायद डस्टबिन का काम कर रही है। बाकी कुछेक रद्दी पेपर। उसी सब के बीच दो-चार किताबें हैं जिन्हें हाथ में पेंसिल लिये गहरी सांवली रंगत पर सपनों की झिलमिलाती चमक  सजाए पाँच-छह वर्षीय एक बच्चा पढ़ रहा है। उसकी मोटी आँखों में दूर तक उजाला साफ़ दिखता है। मेरी बेटी को देख उस उजाले का एक टुकड़ा उसके गालों तक उतर आया है। मैं सीधी खड़ी होती हुई  अपना दायाँ हाथ उठा देती हूँ  अंडेवाले के सम्मान में।

वह जो नहीं कहा / स्नेह गोस्वामी
सुबह 6 बजे
सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँवर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं
स्नेह गोस्वामी
सुनती हो चाय बनाओजल्दी से  खाना लाओचादर नहीं झाडी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोयी रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है। आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होवोगेफिर भी बाय!
सुबह 10 बजे
सुनो जानूमीटिंग शुरू हो गई क्यापक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनायाचटखारे ले कर खाया। रोज-रोज आलू के परांठे खा के उब गयी थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूंगी। जब तुम घर होते हो तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं या फिर कोई मैचवह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा सा सीरियल शुरू हो गया हैइसलिए बाय!
दोपहर 3 बजे
जानूआज मैंने कई दिनों बाद फिल्म देखी। लगा थाजिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं दिल अभी धड़क रहा है। पुराणी फिल्म थी साहिब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी हैगरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी  जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियां क्यों अच्छी लगती हैंबेशक कोई बाहर वाली घास भी न डालेपर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरेआज सफाई तो की ही नहीं। चलोअब थोड़ी सफाई कर ली जायफिर खाना सोचूंगी। बाय!
शाम 7 बजे
जानू,  शाम को सफाई में ही तीन घंटे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजारोशनदान झाड़ कर चमकाये। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलींसोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी जो रात तुम्हारे लिए बनाई थीउसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ,  ठीक! बाय !
रात 11 बजे
सुनो जानूशाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे थापर कोफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थेंपर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानीवही करेक्टरवही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाईट!
रात दो बजे
सुनो जानू,  तुम तो सो चुके होवोगेपर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें  सुबह से अब तक नहीं सुनी। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही इसलिए। कारण जो भी हो पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत हो कर सोना चाहिये था न,  फिर भी नहीं सोई। तुम से पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी। क्योंकि जब तुम घर में रहोगे तो यह घर तुम्हारा ही होगा.  तुम ही बोलोगेतुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ– ‘जीआई जीजी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है। 

पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                      https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… तीसरी कड़ी

ज्ञान का प्रकाश / पवन जैन
एक बडा सा पंडालउसमें पाँच फुट ऊँचा स्टेज। स्टेज पर सिंहासनसिंहासन पर बैठे महंत जी जिनके गले में रूद्राक्ष की माला और मोटी मोटी सोने की तीन-चार जंजीरेंउनकी मंद-मंद मुस्कान जनता को प्रभावित कर रही थी।
आज नौ दिन का यज्ञ सम्पन्न हुआसमापन पर आसपास के गांवों से जुड़ा हजारों की संख्या में यह जनसमुदाय जय जयकार के नारे लगा रहा था।
प्रकाश ने प्रचार प्रसार में जी जान जो लगा दी थीहजारों की यह भीड़ पिछले कई  दिनों से की गई उसकी मेहनत का ही तो परिणाम था। महंत जी ने उसे अपना दाहिना  हाथ बना लिया था तथा विशेष आशीर्वाद देने का आश्वासन भी दिया था।
नौ दिनों तक खूब धार्मिक वातावरण रहाप्रवचनभजनभक्ति और आरतीजनता ने भी जी खोल कर चढ़ावा चढाया।
अनुमान से बहुत ज्यादा दीक्षायें दे कर महंत जी प्रसन्न थे एवं जनता को आशीर्वाद दे रहे थे ।
अचानक प्रकाश ने मंच पर आ कर घोषणा की , "महंत जी आज बहुत खुश हैइस गाँव को निरंतर ज्ञान मिलता रहे इसलिए चढावे की पूरी राशि एक विद्यालय बनाने में लगायेंगे।"
पंडाल में चारों तरफ से गूंज रही तालियों की आवाज से महंत जी का दिल बैठ रहा था।
यज्ञ समापन पर पधारे जिलाधीश ने सहमति देते हुऐ घोषणा की, "यह यज्ञ भूमि विद्यालय को आबंटित की जाती है।" 
उन्होंने महंत जी के हाथों में कुदाली पकड़ाकर तुरंत ही भूमि पूजन हेतु मजबूर कर दिया।
महंत जी ने क्रोध से कुदाली चलानी शुरु कीदस्तूर हो चुका था पर अब भी उनकी कुदाली रूक नहीं रही थी।
उनके पसीने की बूंदे मिट्टी में मिल रहीं थी पर लगातार बदलते चेहरे के भावों से स्पष्ट हो रहा था कि था कि अब उनका क्रोध शांत होता जा रहा है ।
कुछ ही देर में वे खडे़ होकर बोले, "प्रकाश तुम्हारा रोज दीपक जलाना मुझे समझ आ गयातुम प्रवचनों में ज्ञान ढूंढ रहे थे और मैं पैसों की खनक देख रहा था। पर इन पसीने की बूंदों से मेरा लोभ भी अब धुल गया है।"  
"आओ एक दीपक जलाओ जिसकी रोशनी दूर- दूर तक फैले।"
                             
मूछ का ताव / लक्ष्मी नारायण अग्रवाल

"क्या हुआ गोवर्धन जमीन गिरवी क्यों रख रहे हो ?'
 "क्या बताऊं लाला पिछली बार फसल अच्छी हुई थी। बेच कर हाथ में पैसा आया भी था कि एक दिन पड़ौसी का बेटा नई मोटर साइकिल ले आया और मूछों पर ताव देते हुए मेरे घर के सामने से चार  चक्कर लगा डाले । मुझे और मेरे बेटे को गुस्सा आ गयापैसे तो हाथ में थे ही हम गए और उनसे  भी मंहगी एक मोटर साइकिल ले आएबचे हुए पैसे बीज और खाद में लग गए। लेकिन इस बार सूखा पड़ जाने से अगली फसल के लिए पैसे नहीं हैं। पहली बार बेटी पेट से है उसकी ससुराल भी कुछ तो भेजना पड़ेगा।'
"तो मोटर साइकिल बेच दो ।'
 "लड़का बेचने ही नही देता ।'
 "तुम उसके बाप हो या वो तुम्हारा ?'
 "बहुत कोशिश की मानता ही नहींउसी के नाम पर जो है ।'
 "तो भाई गोवर्धन इसका मतलब तो ये हुआ कि पड़ोसी अगर कार ले आए और तेरे घर में किसी के  पैसे रखे हैं तो तुम कार ले आओगे।'
"हाँ लाला, गल्ती तो हुई है।'
 "अच्छा ये बता तेरी जमीन कितनी है?'
 "तीन एकड़ ।'
 "और पड़ोसी की?'
 "तीस ।'


 काला अध्याय / राधेश्याम भारतीय
वह औरत अपने पति के कत्ल-केस मे सजा काट रही थी।
कारागार में जितने भी कैदी थेउन सबके रिश्तेदार उनसे मिलने आते थे। औरत का मन भी अपने बच्चों से मिलने को बेचैन हो उठता। उसने जेलर से प्रार्थना की कि वे उसे उसके बच्चों से तो मिलवा दें। कई बार कहने के बाद आज उसकी दोनों बेटियां उससे मिलने आई थीं।
उसे उसकी बेटियों के पास ले जाया गया। वे जाली के दूसरी ओर खड़ी थीं।
आओमेरी बेटियो, आओ  मेरे गले लग जाओ!” औरत मानो उनके बीच जाली की दीवार को फाड़कर उन्हें गले लगा लेना चाहती थी।
बोलो बेटी बोलो। कुछ तो बोलो। तुम चुप क्यों हो? मैं तुम्हारी माँ हूँ....
माँ!…कैसी माँ…किसकी माँ ! तू माँ नहीं, डायन हैडायन! तू हमारे बाप को खा गई। ...छिःछिः तूने प्यार में अंधी होकर…।
प्यार नहीं दीदी, हवस!…अंधी हवस...” छोटी बेटी ने भी मन की आग उगल दी।
मुझे इसकी सजा मिल रही है…।”
“...तुम्हें तो तुम्हारे किये की सजा मिली हैलेकिन हमें?…हमें किस जुर्म की सजा मिली…?”
तुम्हें किसने सजा दी?”
तुम्हारे पाप ने....!
मेरे किये की सजा तो मैं भुगत रही हूँदेखोमेरे कपड़ों की ओर ।
“...और जो दिखाई न देवह सजा नहीं?…मेरे दादा-दादी अपने बेटे की याद में कैसे तिल-तिल मर रहे हैंक्या वह सजा नहींऔर उससे बड़ी सजा…चंद सालों बाद जब दादा-दादी नहीं रहेंगे तो कैसे ‘गिद्ध’ हमें नोच-नोच खायेंगे…” इतना कहते-कहते बड़ी बेटी फूट-फूटकर रोने लगी।
उसे रोते देख छोटी बेटी भी बिलख पड़ी।
                                
पहचान तलाशते रिश्ते / रणजीत टाडा
बाद दोपहर का समय था। सूरज अपने पूरे तेज के साथ चमक रहा था। सड़कों पर चहल-पहल थी। स्कूल की छुट्टी के बाद  मैं घर लौट रही थी। लोकल बस स्टॅाप से घर के लिए मुझे काफी पैदल चलना पड़ता है। सड़क के तीन मोड़। अभी दूसरे मोड़गैस एजेंसी वाली सड़क पर मुड़ी ही थी कि पीछे से एक कार बराबर आ कर रूकी। दो लोग उतरे और मुझे कार में खींचने लगे। मैंने पूरी ताकत से विरोध किया। मुझे निढ़ाल करने के लिए वे थप्पड़़-घूसे मारने लगे। मेरी साधारण-सी सलवार-कमीज फाड़ने की कोशिश की।
        मैं संघर्ष करते हुए मदद के लिए चिल्लाई। लेकिन कुछ ही दूरी पर गैस एजेंसी के बाहर खड़े छः-सात लोगों के कानों पर जूं तक न रेंगी।
        तभी वहां से गुज़र रहे एक बुजुर्ग ने ‘हैल्प-हैल्प!‘ चिल्लाते हुए उन लोगों को उनके मुर्दापने पर डांटा तो उनमें से एक ने उल्टा बुज़ुर्ग से ही पूछा, ‘‘आप उसके क्या लगते हो?‘‘
        बुज़ुर्ग गुस्से में चीखा, ‘‘शर्म आनी चाहिए तुम लोगों को! किसी औरत से रिश्ता न हो तो क्या एक अनजान आदमी उसकी मदद भी नहीं कर सकता?‘‘ फिर भी उन लोगों की आत्मा न जागी।
 लेकिन मेरे कमजोर संघर्ष में शायद उस बुज़ुर्ग की चीख शामिल हो जाने के कारण वे मुझे वहीं छोड़कर कार में भाग गए।
मैं एक स्कूल में लगभग बारह साल से पढ़ा रही हूंलेकिन मेरे साथ ऐसा होगाऐसा तो कभी न सोचा था। बुजु़र्ग की तरह मुझे भी अब उन दर्शकों पर गुस्सा आ रहा था। मैनें उनसे पूछा, ‘‘जब मैं चिल्ला रही थी कि कार का नम्बर नोट कर लोतो आपने क्यों नहीं किया?‘‘
एक आदमी बोला, ‘‘हमने सोचाजो आपको ‘रंडी-रंडी‘ बोल रहा थावो आपका पति है!‘‘

आसक्ति / मधु जैन
बनारसी दास ने सर्विस के दौरान अपार दौलत इकठ्ठी की। बिना पैसे लिए कभी किसी का काम नहीं किया। बढ़िया घरबच्चे भी विदेशों में अच्छी जॉब परघर में शानोशौकत की हर चीज मौजूद। पर इस लक्ष्मी के आने से घर की लक्ष्मी रूठ कर परलोक सिधार गई।
बच्चों के पास जाना नहीं चाहते थे क्योंकि उन्हें घर और सामान से अत्यधिक लगाव था।
रिटायरमेन्ट के बाद घर में अकेले। मिलनसार, पर एक नंबर के कंजूस भी थे।
आज काम वाली बाई के कई बार घंटी बजाने पर भी जब दरवाजा नहीं खुला तो वह पड़ोसी अजय से जाकर बोली, "भाईसाब, अंकल जी दरवाजा नहीं खोल रहे।"
किसी तरह दरवाजा खोल अंदर जाकर देखा तो बनारसीदास जी अपनी पत्नी के पास पहुँच चुके थे।
अजय ने उनके बच्चों को सूचना दी तो वे बोले, "अंकल जी, इतनी जल्दी तो हम लोगों का आना संभव नहीं है। आप लोग ही....."
अब अजय ने कालोनीवासियों को इत्तला दी।
"अजय, इनका तो इस शहर में कोई नहीं है। क्यो न हम पुलिस को सूचित कर दें।" कॉलोनीवासियों की सलाह थी।
"हाँ यही ठीक रहेगा।"
पुलिस के आने के पहले ही घर के सभी कीमती सामान कालोनीवासियों  के घरों की शोभा बढ़ा रहे थे।

अबोला / अन्तरा करवड़े
सवा पाँच बज चुके थे। दिन भर की बारिश के बाद की ठिठुरन के चलते चाय का कप उठाते हुए हाथ काँप गएतब न चाहते हुए भी ओढ़ाये गए दुशाले को उन्होंने नागरिक सम्मान की तरह स्वीकार कर लिया था।
ठीक साढ़े पाँच पर रामभरोसे आता है। बारिश के दिनों में वे उसे कुछ पैसे दिये रहते हैंपकोडेजलेबीकचौरी जैसी खुशियाँ खरीद लाने के लिये। आज तो दिन भर से ऎसी मूसलाधार बारिश है कि... याद आते ही स्वाद ग्रन्थियाँ सक्रिय हो जाती हैं। इस उम्र में खुशियों के पैमाने और धीरज का खिंचाव छोटा होता जाता है।
आधा घन्टा बीत गया हैधुआं-धुआं-से रास्ते पर एक लम्बी सी आकृति उभर रही है। रामभरोसे का बेटा।
घर में पूरा पानी भर गया है साहबबापू बीमार हैं। आपकी मदद को भेजा है। कहें तो कुछ पका दूँ।
दमा वाली साँस और साड़ी की सरसराहट से उनकी उपस्थिति दर्ज होती है। आँखे सजलमुख पर पीड़ा और वात्सल्य के मिले-जुले भाव। वे बैठे रहते हैंहाल चाल पूछतेस्वाद ग्रन्थियों की तृप्ति न हो पाने का मलाल करते। अन्दर से गिलास भरकर अदरक वाली चाय और नाश्ता आया है। युवक के चेहरे पर भक्तिभाव तैरने लगा है।
वे कुछ ठगा-सा महसूस कर रहे हैं।
अभी आया,” कहकर कमरे में जाते हैं। तिपाई पर पुराने गर्म कपड़ों की पोटलीपैकेटबन्द नाश्ता और कुछ पैसे रखें हैं। कुछ बोलना चाहते हैं लेकिन बाम की तीव्र गंध और असहयोग आंदोलन के समान उनकी ओर की गई पीठ, इसकी अनुमति नही देती। थोड़ा नरम पड़कर मन ही मन मुस्कुराते ज़रुर हैं।
फाटक लगा लीजियेहम रामभरोसे के घर जा रहे हैं।
जी।” संक्षिप्त-सा प्रतिउत्तर मिलता है। अच्छा लगता है।
रामभरोसे के घर आज वे खुशियाँ बाँटते हैं,  प्रेम की ऊष्मा फैलाते हैं,  तृप्त हो जाते हैं।
वापसी मेंरामभरोसे के भतीजे की रिक्शा में उन्हे घर छुड़वाया जा रहा है। मन ही मन कल्पनाएं कर रहे हैंइतनी सारी खुशियों भरी झोली को खाली करना है...लेकिन। खैरअब उन्होंने सोच लिया हैस्वयं ही बातचीत की पहल करेंगेऔर पत्नी को कभी भी ’बातूनी’ होने का ताना नही देंगे। 
ब्रेकिंग न्यूज़ / सुषमा गुप्ता
"साहब ये तो मर चुका है। बुरी तरह जल गई है बॉडी। और कार भी बिल्कुल कोयला हो रखी है। आग तो भीषण ही लगी होगी।" कॉन्स्टेबल रामलाल अपने इंस्पैक्टर साहब से हताश-सा बोला। बहुत भयानक बदबू फैली थी माँस जलने की। वह बदबू से बेहोश होने को था। फिर भी बड़ी हिम्मत से उसने जाँच की।
"अरे रामलाल, पूछ तो आसपास के लोगों से कुछ देखा इन्होंने?" इस्पैक्टर साहब गरज कर बोले।
भीड़ में से एक आदमी बोला, "सर, कुछ क्या सबकुछ देखा। दस मिनट में तो सब पूरी तरह से जल कर राख हो गया। हम पाँचों यहीं थे तब।"
"आप क्या कर रहें थे पाँचों यहाँआपने कोशिश नहीं की आग बुझाने की?"
"सर हम आग कैसे बुझाते?"
"तो आप सब खड़े देखते रहे?"

"नही सर हमनें वीडियो बनाई है न। अलग अलग ऐंगल सेताकि मीडिया दिखा सके कि ये हुआ कैसे।"                                                                                                                                                                                                                                          पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                                                                                                                                      https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                                                                                                                                               https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s