Tuesday, 5 December, 2017

डॉ॰ शकुन्तला किरण से डॉ॰ लता अग्रवाल की बातचीत

     कम शब्दों में बहुत-कुछ कहने की कला है लघुकथा         डॉ॰ शकुन्तला किरण

[साथियो ! लघुकथा के क्षेत्र में आदरणीया डॉ॰ शकुन्तला ‘किरण’ जी एक जाना-पहचाना और सम्मानित नाम है। आप देश के किसी भी विश्वविद्यालय में लघुकथा के लिए पंजीकृत पहली शोधार्थी व पीएच॰ डी॰ शोधोपाधि प्राप्त व्यक्तित्व हैं (राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर सन् 1976 में पंजीकृत व सन् 1982 में पीएच॰ डी॰ उपाधि प्राप्त)| इस नाते इस क्षेत्र में आज जो भी इतिहास उपलब्ध है उसमें आपकी बड़ी भूमिका है | आपके द्वारा लिखित आलोचनात्मक पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा’ लघुकथा के महासागर का ऐसा लाइट हाउस है जिससे उस राह के राहगीर और पोत सदैव दिशा और प्रेरणा पाते रहेंगे |
सुखद संयोग रहा कि अक्टूबर 2017 में अजमेर यात्रा के दौरान मुझे उनका निकट सान्निध्य मिला | दीदी ने नवें दशक से ही साहित्य पर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से स्वयं को दूर रखा था; किन्तु उस दिन मेरे निवेदन पर (जिसकी मैंने कल्पना नहीं की थी, न ही इस तैयारी के साथ उनसे मिलने गयी थी) उनकी अनुमति से, जो प्रश्न उस समय मस्तिष्क में आये मैंने उनसे किये और उन्होंने सहर्ष उन सबके जवाब भी दिए | जिन्हें आपसे साझा कर रही हूँ |डॉ॰ लता अग्रवाल]

1. डॉ लता अग्रवाल - दीदी, आप भारत की पहली लघुकथा शोधार्थी रही हैं, इसके लिए बधाई स्वीकार करें।कृपया हमारे लघुकथाकार परिवार को बताएँ कि शोध के लिए ‘लघुकथा’ को विषय के रूप में चुनने का ख्याल आपको कैसे आया ?
डॉ शकुंतला किरण जी – धन्यवाद लता | दरअसल मुझे यह सुझाव मुझे स्व. प्रोफेसर कृष्ण कमलेश जी से मिला | मैंने स्वयं इस सम्बन्ध में कभी नहीं सोचा था| किन्तु जब कमलेश जी ने सुझाव दिया, ‘क्यों न लघुकथा पर शोध करो’ तब लगा, चलो पढ़कर देखते हैं | पढ़ा, तो बहुत रोचक विषय लगा और इस तरह यह मेरे शोध का विषय बना |
2. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा की वर्तमान समय में क्या उपादेयता है ?
डॉ शकुंतला किरण – आप देख रही हैं आज हिंदी लघुकथा गद्य के सभी कथात्मक स्वरूपों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में न केवल सक्षम सिध्द हुई है अपितु अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों जैसे, प्रकाशन प्रसारण, मंच, संचार क्रांति आदि पर लिखी और पढ़ी जाने वाली सर्वाधिक लोकप्रिय विधा साबित हुई है | यही इसकी उपादेयता सिध्द करती है |
आपने अपने समय में देखा होगा—प्रसाद जी की कथा चाहे वह ‘आकाशदीप’ हो या 65-70 के दौर के किसी अन्य कहानीकार की कोई रचना, जब उसमें नायक-नायिका का वर्णन होता है अक्सर प्रकृति-वर्णन के साथ वातावरण का भी फैलाव मिलता रहा है । उस समय वह सब पढ़कर अच्छा भी लगता था लेकिन आज के पाठक का टेस्ट अलग है |
पहले लोग ‘चन्द्रकान्ता संतति’ बड़े शौक से पढ़ते थे; किन्तु इस यांत्रिकी युग में पाठक साहित्य का आनन्द भी लेना चाहता है और समय की बचत भी चाहता है | यही सब है, जो लघुकथा की मांग करता है |
3. डॉ लता अग्रवाल - साहित्य का उद्देश्य होता है समाज को नीति की राह दिखाना। क्या लघुकथा भी ऐसे ही किसी उद्देश्य को लेकर चलती है ?
डॉ शकुंतला किरण – इसे मैं इस तरह कहूँगी की साहित्य सदैव अपने युग का प्रतिनिधित्व करता है। वर्तमान में बदली हुई मानसिकता के साथ कथा-साहित्य का उद्देश्य भी शिक्षात्मक एवं मनोरंजनात्मक से अधिक सामाजिक यथार्थ से पाठकों को अवगत कराना भी हो गया है, जिसके अंतर्गत गलत व्यवस्थाओं पर चोट करना, समाज के साथ व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक परिवेश की विकृतियों को उघाड़कर  दिखाना उन पर चोट करना, ओढ़े हुए मुखौटों को नोच फेंकना हो गया है। लघुकथा इन सब उद्देश्यों की पूर्ति करती है |
4. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा अपने समापन के बाद पाठक के मस्तिष्क को झकझोरती  है’ आपके ही इस कथन पर आपके विचार चाहेंगे।
डॉ शकुंतला किरण – लघुकथा पाठक को कुछ सोचने पर विवश करे। जैसे आपकी लघुकथा ‘गरीब का लंच बॉक्स’ सोचने पर विवश करती है कि हमारे बाहरी आवरण कितने खोखले हो गये हैं | हम मासूम बच्ची को भी अपनी संवेदनहीनता का शिकार बनाने से नहीं चूक रहे , तो लघुकथा कम से कम पाठक के ह्रदय को कुछ सोचने पर विवश करे, उसे एक चिन्तन बिंदु सौंपे |
5. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा के स्वरूप में कथ्य और तथ्य में परस्पर  तादात्म्य  कहाँ तक होना चाहिए ?
डॉ शकुंतला किरण – दोनों का समान रूप से महत्व है | देखिये, तथ्य और कथ्य दोनों लघुकथा के महत्वपूर्ण अंग हैं | आपके पास तथ्य है तो उसे कथा में ढालने के लिए कथ्य की आवश्यकता होगी | इसके लिए आपको प्रभावी प्रस्तुतिकरण  हेतु समस्त परिस्थितियों का निर्माण करना होगा ताकि तथ्य प्रभावशाली बने | पुन: आपकी लघुकथा ‘गरीब का लंचबॉक्स’ से समझने का प्रयास करते हैं |आपके पास तथ्य है—‘एक गरीब लड़की’, जिसे सरकारी योजना के तहत एक सम्पन्न निजी स्कूल में प्रवेश तो मिल जाता है किन्तु स्कूल के शिक्षक और छात्र उसके स्तर का उपहास करते हुए सच को स्वीकार नहीं करना चाहते  |’ यह तथ्य है। इसे सीधे-सीधे कहने पर यह बात पाठकों को इतनी प्रभावित नहीं करेगी  | आपने इसके लिए स्कूल का माहौल रचा, मीरा और कुछ पात्र तैयार किये उनमें एक निक्कू भी है | फिर लंच बॉक्स को लेकर एक शिक्षक के द्वारा संवाद कहलवाए और अंत में कथा को चरमोत्कर्ष देने के लिए निक्कू के ड्राइवर द्वारा वह लंचबॉक्स दिलवाया, जो पाठक के मन में मीरा के प्रति गहरी संवेदना छोड़ गया | यह है तथ्य और कथ्य का संतुलन। यदि केवल मात्र तथ्य या फिर कथ्य ही प्रमुख होगा तो बात न पाठक के मर्म को नहीं छुएगी, न ही इतनी प्रभावोत्पादक होगी |  
6. डॉ लता अग्रवाल - आजकल लघुकथा के शब्द सीमा में निरंतर विस्तार हो रहा है इससे नव लेखकों में बहुत भ्रम की स्थिति है |क्या इसका कोई निश्चित प्रारूप या शब्द सीमा है आपकी दृष्टि में ?
डॉ शकुंतला किरण जी – मेरी दृष्टि में, कभी कोई  लघुकथा किसी एक निश्चित शब्द सीमा में नहीं बांधी जा सकती | यह तो कथ्य की मांग पर निर्भर है | आपको मकान बनाना है या अस्पताल ? यह पहले तय करना होगा फिर उसके अनुरूप ही आप भूमि एवं भवन निर्माण के नक्शे का चयन करेंगे न ? तो यह कथ्य की मांग पर निर्भर करता है | हाँ ! इतना अवश्य कहूँगी कि प्रत्येक कथ्य के लिए अलग विधा है। यदि कथ्य लम्बे हैं तो कहानी, मनोरंजन प्रधान हैं तो चुटकुले हैं तथा  तीखेपन के लिए व्यंग्य आदि विधाएं  हैं । हर कथ्य लघुकथा के लिए उपयुक्त नहीं होता । लघुकथा में बात संक्षिप्त , प्रभावशाली तथा  शब्दों के आडम्बर से दूर अपेक्षित है |
7. डॉ लता अग्रवाल - क्या कहानी का ही संक्षिप्त रूप माना जा सकता है लघुकथा को ?
डॉ शकुंतला किरण जी – ‘कथ्य’ किसी भी रचना की आत्मा होता है | कहानी और लघुकथा के कथ्य में प्रवृत्तियों और विस्तार की संभावनाओं का अंतर होता है | आप कहेंगे हाथी और चींटी की आत्मा में भला क्या अंतर ? तो कहानी का कथ्य बहिर्मुखी होता है—कमल के फूल की तरह, वहीँ लघुकथा अन्तर्मुखी होती है ठीक आक के फूल की तरह | विस्तार की सम्भावना कथ्य में निहित होती है | जैसे बीज पर निर्भर होता है कि वह दो फीट का गुलाब बनेगा या बीस-तीस फीट का देवदार| हम गुलाब को देवदार नहीं बना सकते, न ही देवदार का आकार गुलाब जितना छोटा कर सकते हैं, यदि किसी तरह प्रयास भी किया जाय तो यह उसकी नैसर्गिकता को समाप्त करना होगा   |
लघुकथा और कहानी में वही अंतर है जो एक तार और पत्र में है। पत्र की तुलना में तार में बहुत कम, सीमित और सार्थक शब्द होते हैं; किन्तु उनका प्रभाव पत्र से ज्यादा होता है | इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि कहानी एक पत्र है और लघुकथातार | हालाँकि वर्तमान यांत्रिक परिस्थितियों के सापेक्ष पत्र एवं तार की महत्ता बहुत कम हो गई है | 
8. डॉ लता अग्रवाल - अक्सर नव लघुकथाकार कहानी के विषय को लेकर ही लघुकथा रच डालते हैं इससे कैसे बचें ?
डॉ शकुंतला किरण - बहुत आसान है । देखिये, जिस तरह एक कमरे की दीवार पर लगे वल्ब के प्रकाश का दायरा लगभग पूरा कमरा होता है फलस्वरूप प्रकाश का घनत्व कमरे में चारों तरफ फ़ैल जाने के कारण कम हो जाता है किन्तु  वहीँ वल्ब टेबल लेम्प पर लगकर टेबल के लघु दायरे में सिमटकर सघन प्रकाश देता है | ठीक इसी तरह कहानी में जीवन की अनेक घटनाएँ जुडी होती है अथवा हो सकती हैं, परिणाम स्वरूप कहानी में  फैलाव बढ़ जाता है और फैलाव के मध्य किसी एक घटना का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता | वहीं, लघुकथा किसी एक काल-विशेष की घटना को प्रस्तुत करती है | फलस्वरूप उसके प्रभाव में घनत्व एवं प्रखरता होती है |
9. डॉ लता अग्रवाल - आपकी दृष्टि में एक सार्थक लघुकथा की क्या कसौटी है ?
डॉ शकुंतला किरण – जो पाठकीय सोच को चिन्तन दे, उसके अंतर्मन को झकझोर कर सोचने पर विवश करे वही सार्थक लघुकथा है मेरी दृष्टि में | बस शब्द कम से कम हों, शैली प्रभावशाली हो, कथ्य और तथ्य का सुंदर समन्वय हो | यहाँ स्व. डॉ सतीश दुबे जी की एक लघुकथा ‘पासा’ का जिक्र करना चाहूँगी, पत्नी द्वारा पूछे गये हर प्रश्न के जवाब में पति के द्वारा सिर्फ हाँ, हूँ करने के कारण पहले तो महज औपचारिक संवाद लगते हैं; किन्तु जैसे ही पत्नी कहती है—‘ आज तुम्हारी क्लास फैलो कुसुम आई थी’ पति के जिव्हा पर लगा कर्फ्यू हट जाता है और वह उसके बारे में सब-कुछ जानने को आतुर हो पत्नी पर प्रश्नों की झड़ी लगा देता है, उत्तर में पत्नी का एक वाक्य—‘मैंने उससे ये सभी बाते पूछी थी मगर वह भी हाँ, हूँ ही करती रही’ |
पति,पत्नी के संक्षिप्त संवाद और भाषा की ऐसी कसावट कि एक शब्द या विराम चिन्ह तक भी वाक्य से  हटा लिया जाय तो पूरी कथा लड़खड़ा जाए| किन्तु इस छोटी-सी कथा में जीवन के कई पहलू खुलकर पाठक के सामने आ जाते हैं | कम शब्दों में बहुत कुछ कहने की कला है लघुकथा |
10. डॉ लता अग्रवाल - अपने शोध ग्रन्थ में आपने कहा है – “लघुकथा एक प्रकार से कम आय वाले अर्थशास्त्री का अपना निजी बजट है जिसे वह प्रबुद्धता के साथ बहुत सोच-समझकर इस प्रकार बनाता है कि प्रत्येक पैसे का सदुपयोग हो|” यह पैसे के सदुपयोग की कला के बारे में आपसे जानना चाहेंगे ?
डॉ शकुंतला किरण – जी, यहाँ दो बातों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगी — प्रथम, कम आय वाला साथ ही अर्थशास्त्री भी ; दूसरा, उसका अपना निजी बजट, सरकारी नहीं। एक तो वह अर्थशास्त्री है, मतलब सोच-समझ कर खर्च करने वाला; दूसरा यह बजट उसका अपना है, सरकारी नहीं| अमूमन लोग सरकारी पैसे के लिए इतने गंभीर नहीं होते। क्योंकि पता है—पैसा सरकार का है। यहाँ अपनी जेब से खर्च की बात है तो स्वत: ही सावधान रहता है |जैसे, एक व्यक्ति, जिसकी आमदनी कम है, वह परिवार को चलाने के लिए एक-एक पैसे का सदुपयोग करता है | वह पैसे खर्च करता है उन्हें व्यर्थ उड़ाता नहीं है, लघुकथाकार भी शब्दों का अर्थशास्त्री है|
11. डॉ लता अग्रवाल - कथ्य में विविधता लाने के लिए नव लघुकथाकारों को कोई नुस्खा ?
डॉ शकुंतला किरण – विषय में वैविध्य तो है, बस आवश्यकता है लेखक की दृष्टि उसके गंतव्य तक पहुँचनी चाहिए | यह विषय अनुभवगत या वास्तविक लगना चाहिए , कोरी कल्पना के आधार पर न हों |
12. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा की भाषा कैसी होना चाहिए ?
डॉ शकुंतला किरण जी – आम आदमी की भाषा जिसे आसानी से समझा जा सके, साथ ही पात्रगत भाषा हो | आप स्वयं सोचिये—एक अनपढ़ व्यक्ति के मुख से पंडिताऊ भाषा, एक बुजुर्ग ग्रामीण महिला के मुख से अंग्रेजी के शब्द, एक शराबी अथवा निम्न तबके के व्यक्ति द्वारा शालीन भाषा क्या सहज लगेगी ...? नहीं न| इससे कथा में स्वाभाविकता का वो रस नहीं आ पायेगा | पात्र शराबी या निम्न प्रवृत्ति का व्यक्ति है तो वैसे शब्द हमें लेने होंगे | यथा, ‘चल बे साले ...उल्लू के पट्ठे ...या फिर अनपढ़ व्यक्ति द्वारा—माई बाप ! म्हारी मजबूरी समझो को नी; ग्रामीण महिला—‘म्हारी तो किस्मत ई बदल गी’ कथा को गतिशीलता देने के लिए यह पात्रगत भाषा बहुत आवश्यक हो जाती है|
13. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा में बिम्ब और प्रतीकों के प्रयोग को आप कहाँ तक आवश्यक मानती हैं ?
डॉ शकुंतला किरण – प्रतीक और बिम्ब का प्रयोग उतना ही हो जितना आवश्यक हो,सहजता से आयें | बात को घुमावदार और कथा में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए इनका सायास प्रयोग मैं आवश्यक नहीं मानती |
14. डॉ लता अग्रवाल - फेंटेसी का लघुकथा में क्या स्थान है ?
डॉ शकुंतला किरण जी – मैं लघुकथा में कल्पनावाद के पक्ष में नहीं। कारण, इसका स्वरूप छोटा है अत: कल्पना के लिए इसमें कोई गुंजाईश नहीं | छोटे से रूप में आप क्या - क्या कल्पना करेंगे | यह तो लेखक को तय करना है कि वह क्या कहना चाहता है ? छोटी बात है तो लघुकथा, उससे छोटी है तो हायकू | अगर उसके मस्तिष्क में कल्पना-लोक या वास्तविक जगत की अनुभूतियाँ  है तो इसके लिए कहानी और उपन्यास हैं न | वैसे भी, आज पाठक का अधिकांश समय तो फेसबुक, लेपटोप और कम्प्यूटर आदि ने ले लिया है। आप यह सोचिये—कम समय में, कम शब्दों में, प्रभावी तौर पर आप क्या दे सकते हैं पाठक को ?
15. डॉ लता अग्रवाल – संवाद को रोचक और जीवंत बनाने के लिए कोई मार्गदर्शन दें ?
डॉ शकुंतला किरण जी – पुन: कहूंगी पात्र के व्यक्तित्व को मद्देनजर संवादों की रचना की जाय। उन्हें संक्षिप्त करने के लिए थोड़ा-सा होमवर्क किया जाय तो निश्चित ही संवाद अच्छे बन पड़ेंगे |
16. डॉ लता अग्रवाल - कथा में पात्र प्रमुख होना चाहिए या घटनाएँ ?
डॉ शकुंतला किरण – घटना नहीं है तो पात्र क्या कहेंगे ? यदि पात्र नहीं है तो घटना कैसे दर्शाई जाएगी ? यह वही बात हो गई—‘एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गये खत्म कहानी |’ घटना में जीवन्तता लाने के लिए पात्रों की रचना करनी होती है | पात्रों से कहलवाने के लिए घटना गढ़नी पड़ती है | तभी कोई बात पाठक को प्रभावित करती है | दोनों तराजू के दो पलड़ों की तरह अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं |
17. डॉ लता अग्रवाल - आंचलिक परिवेश को चित्रित करते समय लेखक को किन बातों की सावधानी रखना चहिये ?
डॉ शकुंतला किरण जी – आंचलिक परिवेश पाठक को नजर भी आना चाहिए | लघुकथा दृश्य सामग्री तो है नहीं, इसे केवल पात्रों के माध्यम से ही अनुभव कर सकते हैं | अत: पात्रों के संवाद या उनकी उपस्थिति के साथ उनके परिधान एवं परिवेशगत चित्रण में दूरदृष्टि एवं सजगता अपेक्षित है |
18. डॉ लता अग्रवाल - शीर्षक का चुनाव करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
डॉ शकुंतला किरण लघुकथा का शीर्षक कथ्य से सम्बन्धित, प्रभावोत्पादक साथ ही रोचक हो |
19. डॉ लता अग्रवाल - नवांकुर लघुकथा लेखकों के लिए क्या सन्देश है ?
डॉ शकुंतला किरण – केवल इसलिए न लिखें की लिखना है,  बजाय इसके कि जो बात, घटना आपको भीतर तक कचोटे; लगे कि इसे शब्द देने ही पड़ेंगे, तब लिखें |
20. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा का उद्देश्य चरित्र एवं विसंगतियों की ओर संकेत करना मात्र है न कि उनका उपचार बताना | ऐसा क्यों?  साहित्य का लक्ष्य तो सर्व कल्याण होता है।
डॉ शकुंतला किरण – सर्व कल्याण के लिए  हितोपदेश की कहानियाँ, वेद पुराण के प्रसंग , नैतिक कथाएं, धर्मग्रंथों के उद्दरण ये सब चरित्र निर्माण को आधार बनाकर ही रचे गये हैं | दूसरे, जरा गौर से देखें तो इन लघुकथाओं में भी जब पाठक को उसकी अंतर्चेतना झकझोरती है तो अपने आप वह समस्या के समाधान के बारे में भी सोचता है | अत: यह काम पाठक को ही सौंपे तो बेहतर है |
21. डॉ लता अग्रवाल – नव-लघुकथाकारों से किस नवाचार की अपेक्षा आप रखते हैं ?
डॉ शकुंतला किरण – उनके अपने अनुभव हैं, अनुभूतियां है जो उन्हें  विवश करेंगी। अनुभूति का वेग जितनी तीव्रता लिए होगा, उतना सार्थक लेखन होगा | लेखन में कोई क्षेत्र निश्चित हो, यह मैं उचित नहीं मानती | लेखन को टारगेट बनाकर या सीमा में बांधकर नहीं लिखना चाहिए |
22. डॉ लता अग्रवाल - लघुकथा का भविष्य कैसा देख रही हैं आप ?
डॉ शकुंतला किरण – बहुत उज्जवल ! आज लघुकथाओं को लेकर जगह- जगह  प्रतियोगिताएं हो रही हैं, सम्मेलन हो रहे हैं, संगोष्ठियाँ हो रही है, मंच पर पठन हो रहा है , विधागत पत्र- पत्रिकाएँ निकल रही है, लघुकथा विशेषांक निकल रहे हैं, लोग इस बारे में सोच रहे हैं, भले ही वह लेखक बनने की धुन या अन्य किसी धुन में हो रहा है, हलचल तो हो रही है | मतलब लघुकथा प्रभावित कर रही है लेखक और पाठक दोनों को | तो निश्चय ही इसका भविष्य उज्ज्वल लग रहा है |

संपर्क 
डॉ शकुंतला ‘किरण’                                                 
निदेशक, मित्तल  हास्पिटल,                          
पुष्कर रोड, अजमेर (राजस्थान ) – 305004         
shakuntalakiranmittal@gmail.com                                                                            डॉ लता  अग्रवाल, 
73, यश विला, 
भवानी धाम फेस-1नरेला शंकरी,  
भोपाल – 462041        
agrawallata8@gmail.com

Tuesday, 14 November, 2017

पंजाबी कथाकार गुरदीप सिंह पुरी की लघुकथाएँ

सारे जहां से अच्छा
इस बार पंचकुला में आयोजित 26 वें अन्तरराज्यीय लघुकथा सम्मेलन में डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति की ओर से जो सामग्री बाँटी गयी उनमें गुरदीप सिंह पुरी के पंजाबी लघुकथा संग्रह ‘सारे जहां से अच्छा’ (1998) का हिन्दी रूपान्तर भी शामिल था। इसका रूपान्तर किया है श्री के॰ एल॰ गर्ग ने और भूमिका प्रि॰ दलीप सिंह भूपाल व डॉ॰ श्याम सुन्दर दीप्ति ने लिखी है। यहाँ पेश हैं उस संग्रह से तीन लघुकथाएँ :

पहली बार रोये
एक मुहल्ले के लोगों को अपने मुहल्ले में गुरुद्वारा बनाने का चाव चढ़ा।
उन्होंने घर-घर जाकर धन इकट्ठा किया और एक निहायत खूबसूरत गुरुद्वारे का निर्माण कर लिया। नाम रखा—श्री कलगीधर गुरुद्वारा।
पहला साल अच्छा व्यतीत हुआ।
अगले वर्ष गुरुद्वारा कमेटी चुनाव में मुहल्ले के दो धड़े बन गये।
अलग हुए धड़े ने अपना नया गुरुद्वारा खड़ा कर लिया। सोच-सोच कर नाम रखा—गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर जी।
अब हर कार्यक्रम के वक्त इस गुरुद्वारे की कमेटी गुरु-घर के बाहर खड़ी होकर ‘कलगीधर गुरुद्वारे’ जाने वाली संगत को रोककर रोष से कहती है :
 “तुम्हें शर्म आनी चाहिए। बाप का घर छोड़कर पुत्तर के दर पे जाते हो! घोर बेअदबी!”
पिता-पुत्र अपने सिक्खों पर पहली बार धाहें मार-मार कर रोए।

बोझा
“यार, जब से यह नयी कमेटी आयी है न, ससुरों ने गुरु-घर में सुधार-लहर ही चला दी है!” गुरु-घर के ग्रंथी सिंह ने बड़े दु:खी स्वर में कहा।
“वह कैसे?” दूसरे गुरु-घर के ग्रंथी ने गुरु-भाई से हैरानी से पूछा।
“देखो न—नयी गुल्लक धर दी है! इसमें न चिमटी पड़ती है और न ही गोंद वाला डक्का। अब ये छोटी-छोटी हरकतों पे उतर आये हैं। रात के अखंड-पाठ की माया भी गुल्लक में डाल देते हैं।”
“हूवर (वेक्यूम मशीन) चला लिया कर न! ऐसे मन क्यों मैला करता है।”
सुनते ही पहले ग्रंथी के सिर से मनों बोझा उतर गया।

बूढ़ी भिखारन
“बेटा, सुबह का कुछ नहीं खाया। भगवान के नाम पर रोटी दे दे! भगवान तुझे लम्बी उम्र दे। तेरी कुल ऊँची हो। तेरा आँगन खुशियों से भर जाये।” बूढ़ी भिखारन ने दफ्तर के लॉन में बैठे बाबू को रोटी वाला डिब्बा खोलते देख मिन्नत-सी की।
बाबू ने डिब्बा खोला तो उसमें पहले की तरह तीन रोटियाँ ही थीं, जिनसे बाबू का ही पेट मुश्किल से भरता था।
उसने दो रोटियों पर थोड़ी-सी सब्जी रखकर बुढ़िया की तरफ बढ़ा दी।
बूढ़ी के थिरकते होठों से बस यही निकला :
“बेटा, रोटियाँ तो तीन ही हैं! आप खा लो। मेरा क्या है, मैं कहीं और से माँग लूँगी। कहीं आप भूखे रह गये तो… ”
बुढ़िया लाठी टेकते आगे सरक गयी। बाबू कितनी ही देर अपने आँसू ठेलने की कोशिश करता रहा।


गुरदीप सिंह पुरी  की अन्य कृतियाँ :
कहानी संग्रह
1 उदासे फुल बहारां दे (1981)
2 ख्वाहिश (1990)
3 इक रात दा कत्ल (1990)
मिन्नी कहानी संकलन का संपादन
गुआचे दिनां दी भाल (1992)
मुलाकातें
बिन तुसां असी सखने (1985)
काव्य संग्रह
सखने हथ (1994)
निवास  का पता : 73-मैडक्नि स्ट्रीट, 3-एल, व्हाइट इंच, ग्लासगो जी-149 आर॰ टी॰ (यू॰ के॰)

Friday, 10 November, 2017

डॉ॰ सतीश दुबे को याद करते हुए

न हन्यते हन्यमाने शरीरे

गत एक वर्ष मन लगातार उद्विग्न रहा है; और 25-26 अक्टूबर के बाद तो कोई दिन ऐसा नहीं बीता जब अन्दर ही अन्दर आँसू लगातार न झरे हों।
लघुकथा लेखन ने जो बृहद् परिवार दिया है, उसमें से किसी का भी चले जाना मस्तिष्क को हिला जाता है, ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ को जानते हुए भी।
डॉ सतीश दुबे
जीवन में कई बार ऐसा घटित होता जाता है कि मस्तिष्क जो कहता है, मन उसे स्वीकार नहीं करता, तर्क पर तर्क देता हुआ अपनी बात मनवाता रहता है। गत 25 दिसम्बर, 2016 से अब तक यह लगातार हुआ है। इनके सन्दर्भ में राम-नाम के सत्य को मन स्वीकार नहीं कर रहा है। 
उम्र में और लेखन में भी, बहुत वरिष्ठ होने के बावजूद उनका सम्बोधन ‘आप’ ही रहता था। कई सालों से प्रत्येक नवरात्र की नवमी तिथि को मैं उन्हें फोन किया करता था। एक बार नवमी के बजाय दशहरे की शाम को किया तो उधर से बोले—“हाँ, मैं कल आपके फोन का इन्तजार करता रहा। अब सोच ही रहा था कि आज तो आपका फोन जरूर आएगा।” लेकिन विडम्बना देखिए कि इस साल (मार्च-अप्रैल 2017 में पड़े) चैत्र नवरात्र की नवमी भी खाली गयी और सितम्बर 2017 में पड़े शारदीय नवरात्र की नवमी भी। ऐसा नहीं कि भूल गया था; याद रहा, इस बार तो हर बार से ज्यादा याद आया, लेकिन फोन की ओर हाथ बढ़ाने की, नम्बर डायल करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
सुरेश शर्मा जी
रोना ऐसा भी होता है, सच कहूँ, पहली बार जाना। आँसू अब से पहले भी भीतर गिरते रहे हैं, लेकिन अब से पहले इतनी गहराई से महसूस नहीं किया था।
इन्होंने ही सुरेश शर्मा जी के चले जाने की सूचना फोन पर दी थी। संयोग से उस समय नासिक में था और त्र्यम्बकेश्वर दर्शन की ओर मेरा मुख था। शायद इसीलिए शर्मा जी के प्रति मन अनजानी श्रद्धा से भर गया था। त्र्यम्बकेश्वर महादेव के प्रांगण में बैठकर कुछ समय सुरेश शर्मा जी की ओर से जाप किया था। तब से, जब भी देव-दर्शन का संयोग बनता है, सुरेश शर्मा जी मेरी स्मृति में आ जाते हैं। जैसे मैं अपने पिताजी-चाचाजी की ओर से मंत्र जाप करता हूँ, सुरेश शर्मा जी की ओर से भी करता हूँ। उस कड़ी में अब ये भी आ जुड़े हैं। सोचा नहीं था कि इतनी जल्दी आ जुड़ेंगे।
गत 1 नवम्बर, 2016 को मेरे मोबाइल पर संदेश आया—‘जन्मदिन मुबारक हो।’ मैंने तुरन्त फोन किया—“प्रणाम भाईसाहब, अभी से?”
बोले, “हाँ।”
“लेकिन मुझसे पहले तो आपका जन्मदिन पड़ेगा?”
बोले, “बलराम भाई, पहले-बाद का मसला ही नहीं है। यह पूरा माह हमारा है। इसलिए पहले ही संदेश भेज दिया कि कहीं आप बाजी न मार लें।”
‘कोई दूसरा बाजी न मार ले’ की स्पर्द्धात्मक भावना का यह स्नेह-पक्ष था। उसके बाद तो 12 नवम्बर को भी बात हुई, 26 नवम्बर को भी और एक बार सम्भवत: दिसम्बर के पहले-दूसरे सप्ताह में भी। इतनी जल्दी-जल्दी वार्तालाप के बीच से संवादकर्ता का उठकर अनायास चले जाना कचोटता है। आखिर हुआ क्या? भरे-पूरे परिवार को, हँसती-खिलती महफिल को एकाएक भौंचक कर, बिना कुछ बताए क्यों चले गये?
लेकिन, यह शिकायत करें किससे? पूछें किससे?
इन सवालों के बावजूद हम निश्चिन्त हैं। क्यों? इसलिए कि हमारा विश्वास जैसे ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु’ में है, वैसे ही ‘ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ में भी है; और ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’ में तो अटूट है। ‘न हन्यते’ के रूप में उनका लेखन हमारे बीच मौजूद है, मौजूद रहेगा।
मन है कि उनके इस मौन को उनकी कुछ लघुकथाओं के माध्यम से तोड़ू; लेकिन इस समय नहीं। यह जिम्मेदारी उठाने की स्वस्थ मन:स्थिति में नहीं हूँ। यह समय उनकी स्मृति को नमन करने का है। 12 नवम्बर का इन्तजार मुझ पर बहुत भारी पड़ रहा है, इसलिए आज ही इस पोस्ट को डाल देने को विवश हूँ। मित्रगण क्षमा करें।                                                                –बलराम अग्रवाल   

Saturday, 4 November, 2017

पंचकुला-2017 : हिन्दी लघुकथाएँ… चौथी कड़ी

नजदीक की दूरी /  सतविन्द्र कुमार राणा                                                               
सतविन्द्र कुमार राणा
काम से घर लौटते हुए गली में ही गर्म तेल की महक महसूस हुई। घर में घुसते ही अपने ही घर के चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ी दिखी। अनुमान लगाना मुश्किल न था, किसी का जन्मदिन अथवा सालगिरह होगीतभी ऐसा होता है। अक्ल के घोड़े दौड़ाना शुरु ही किये थे कि पिताजी की आहट सुनाई दी।
"पापा जी सालगिरह मुबारक होआज आपकी और मम्मी जी की शादी  सालगिरह है न?" मंझली बहू धीरे-से बोली।
"आँ...हाँ..हाँग्यारह मई हैआज ही।याद करते हुए बोले।
"बहूइसको क्या ध्यान रहना थाकभी ये चोंचले किये ही नहीं।"
 माँ की शिकायत में तंज था।
दूसरी बहू ने छेड़ा, "पापा जी को नया फोन मिलेगा आज तो गिफ्ट में।"
पिता जी धीमे-से मुस्कुराए।
छः बेटों के किसान पिता। सब बच्चे अब बाप बन चुके थे। छः कमरे का मकानसंयुक्त परिवार का घर था।
चाय के साथ सब ने पकौड़े खाए। सबने उन्हें सालगिरह की बधाई दी। पिताजी को सस्ता-सा नया फोन मिलाजिसे वे आसानी से चला सकते थे।
चलने के लिए उठे तो माँ ने टोका, "कहाँ चल दिए अब?"
पिता जी झट से बोले, "वहीँ जो बरसों से मेरा ठिकाना हैतबेले के साथ वाला कोठड़ा।"
अब माँ चुप थी।
पिताजी आगे बोले, "तू सँभाल अपने पोते-पोतियों को और मैं सँभालूँ भैंसों को।"
दोनों के होठों पर मुस्कान और आँखों में  विवशता झलक रही थी।
पिता जी चले गए।
माँ बड़बड़ा रही थी ,"बड़े परिवार में बड़े पास रहते हैंपर एक साथ नहीं।"
                                  
 मौन शब्द  /  विभा रश्मि
विभा रश्मि
"सुनो ! दोनों में नोक-झोंक चल रही है। आज सुबह से बहू-बेटे में रूठना-मनाना जारी है।"
घबरा कर अधेड़ पत्नी अपने पति से बोली।
"सुनो! उनके बेडरूम से तेज़ आवाजें आ रही हैखूब झगड़ रहे है।"
"क्योंक्या हुआ?" पति का स्वर चिन्तित था।
"शिकायत चल रही हैदो साल हो गये शादी कोबहू ने न जाने कितनी बार हमारे बेटे से प्यार का इज़हार किया। पर हमारे बेटे ने ‘वे शब्द’ नहीं बोले पलट केजो आजकल बोलने का बहुत फ़ैशन हो गया है।"
"क्या नहीं बोलकौन-से शब्द?" पति का सवाल था।
"वोही···…।" पत्नी के नेत्रों में इस उम्र में भी रंगीन बल्बों की लड़ियाँ जल उठी थीं।
"अच्छा…अच्छा··· ।" पति समझ गया।
उसे लगा पत्नी कहीं वे 'खास शब्दबोल न पड़े। आगे बढ़ कर उसने अधेड़ पत्नी की मुलायम हथेली अपनी दोनों हथेलियों में कैद कर उसे चुप करा दिया और उसे असीम प्यार से तकता रहा।
                         
 दूसरे की माँ /  सीमा जैन
सीमा जैन
"अजब इंसान है तू! तुझमें थोड़ी-बहुत इंसानियत भी बची है या नही? …तुझे अपनी अपाहिज़बीमार माँ से मंदिर और पूजा की ज़्यादा चिंता है। माँ का ज़रा भी ख़्याल नही…?" मेरा दोस्त श्याम एक साँस में सब कुछ कह गया।
 मैंने थकी-सी आवाज़ में कहा,  "माँ की चिंता है तभी तो एक पुजारी का इंतज़ाम करने के लिए भटक रहा हूँ। जो मेरे पीछे त्यौहार के समय मंदिर को संभाल ले।” फिर अपने आँसू पीते हुए मैंने बात आगे बढ़ाई, “ ये मंदिर की नौकरी ही तो हमारी रोज़ी-रोटी है। ये चली गई तो मैं माँ के साथ सड़क पर आ जाऊँगा…मुझे अपने कैंसर के इलाज़ के लिए शहर जाना है।”
दोस्त को सोच में पड़ा देख उसने आगे कहा, “और ये सलाह माँ ने ही दी है दोस्त कि कोई मंदिर संभालने को मिल जाये तो तू शहर चला जा…एक बार नंबर चला गया तो फिर पता नही कब लगे?
“हाँ यार, ये समस्या तो है। तुम अकेले ही हो माँ की देखभाल करने वाले।” श्याम बोला।
 “…और यदि मैं भी न रहा तो..."
श्याम ने मुझे रोककर मेरा हाथ थाम लिया, "तुम चिंता न करो, मैं घर और मंदिर दोनों संभाल लूंगा…हमारे मंदिर को पिताजी देख लेंगें।"
मैंने खुश होते हुए कहा, "अपनी माँ को तो सभी संभालते  हैं, पर दूसरों की माँ को संभालने वाले बहुत कम हैं। तुमने मेरा बहुत बड़ा बोझ उतार दिया श्याम।"
एक दर्द भरी मुस्कान के साथ वह बोला- "अब तो अपनी माँ को संभालने वाले भी कम हो रहे हैं दोस्त!"

खमियाजा / पवित्रा अग्रवाल
अरे यार बंसल, बहुत दिनों बाद मिले होकैसे होबच्चे कहाँ हैं?”
पवित्रा अग्रवाल
एक बेटा कनाडा में है और एक अमेरिका में।”
तो क्या तुम और भाभी यहाँ अकेले हो?”
हाँ गुप्ता, अब तो अकेले ही हैं और लगता है मरते दम तक अकेले ही रहेंगे।”
अरे ऐसा क्यों सोचते हो…चल सामने के रेस्त्रां में बैठ कर चाय पीते है।”
रेस्टोरेंट में चाय का इंतजार करते गुप्ता को  बंसल से हुए एक पुराने  वार्तालाप की याद आ गई।  उसने कहा था –‘अरे गुप्ता  तू तो पूरा कंजूस हैइतना पैसा होते हुए भी बच्चों का कैरियर बनाने में पीछे रह गया। मेरे पास तो इतने साधन भी नहीं थे, फिर भी पेट काट कर दोनों लड़कों को इंजीनियर बनाया है। दोनों को बड़ा अच्छा पैकेज मिला है। अब चैन से हूँ। बस दोनों की शादी और हो जायेअच्छी संस्कारी बहुएँ आ जायें तो जिंदगी आराम से कटे।’
            उसने कहा था ‘अरे यार, बेटे तभी तक अपने हैं जब तक शादी  नहीं होती।
चाय आने के साथ ही उसका ध्यान भंग हुआ। बंसल ने पूछा, “तुम्हारे बच्चे कैसे हैंकहाँ हैं?”
        “यहीं हैं हमारे साथ। मैंने तो  ग्रेजुएशन करा के बाईस की उम्र में दोनों की  शादी  कर दी थी । घर के व्यापार में लगे  हैं तो  भाग कर भी कहाँ जायेंगे?...लोग  मुझे हमेशा कंजूस कहते रहे क्योंकि  मैंने बच्चों को डाक्टरइंजिनियर नहीं बनाया। पर अब लगता है कि अच्छा ही किया…ज्यादा पढ़ाता तो कैरियर की तलाश में हमें छोड़ कर कहीं  दूर जा बैठते। फिर इतने बड़े व्यापार का मैं क्या करता?...अब दुःख तकलीफ में हम एक दूसरे के साथ  तो हैं।
       “शायद तुम ठीक ही कह रहे हो। मुझे भी अब  यही  लगता है... बच्चो को ऊँची शिक्षा दिलाने का खमियाजा  तो भुगतना ही पड़ेगा।
                                   
 बेबसी / लता अग्रवाल
लता अग्रवाल
आ ! ले ! ले !” रात के समय तीन आवारा अय्याश सड़क पर बैठी उस पगली को खाने का पैकेट दिखा कर अपनी ओर बुला रहे थे।
खाने के पैकेट के प्रति पगली की लालसा देखकर लगता था उसने काफी समय से कुछ नहीं खाया था। वह उनके पीछे- पीछे उस अँधेरे की और चल दी।
अपनी भूख शांत करने के लिए वह ओरों की भूख का शिकार हो गई।


अंडेवाला /  शोभा रस्तोगी
शोभा रस्तोगी
नुक्कड़ पर रेहड़ी लगाके दुबला और गँवार-सा आदमी अंडे बेचता है। एक के ऊपर एक कई एग-ट्रे रखी हैं | साथ ही गर्म तवा भीजिस पर आमलेट बनता है। कुछ छुटपुट सामान भी। मैं अंडे लेने उसकी रेहड़ी पर पहुँची ही हूँ। चार अंडों का ऑर्डर दिया है। यकायक मेरी तीन साला बेटी मेरा हाथ छुड़ाकर तिरछी-सी झुक गई है। मैं हैरान! तभी देखती हूँ कि अंडेवाले के सिकुड़े से मुंह पर अर्थपूर्ण  मुस्कान फ़िसल आई है जो मुझे बिल्कुल नागवार गुजरी। मैं परेशान और ये… मुस्कान ?  मैं उसे बिना कुछ बोले थोड़ा-सा झुकती हूँ । अब आश्चर्यमिश्रित मुस्कान की बारी मेरी है | रेहड़ी के दोनों पहियों पर लम्बवत्लकडी का एकफट्टा बिछा है। उसपर एक तरफ़ डलिया है जो शायद डस्टबिन का काम कर रही है। बाकी कुछेक रद्दी पेपर। उसी सब के बीच दो-चार किताबें हैं जिन्हें हाथ में पेंसिल लिये गहरी सांवली रंगत पर सपनों की झिलमिलाती चमक  सजाए पाँच-छह वर्षीय एक बच्चा पढ़ रहा है। उसकी मोटी आँखों में दूर तक उजाला साफ़ दिखता है। मेरी बेटी को देख उस उजाले का एक टुकड़ा उसके गालों तक उतर आया है। मैं सीधी खड़ी होती हुई  अपना दायाँ हाथ उठा देती हूँ  अंडेवाले के सम्मान में।

वह जो नहीं कहा / स्नेह गोस्वामी
सुबह 6 बजे
सुनो जानू! आज तुम टूर पर हो तो लग रहा है आज यह घर पूरा का पूरा मेरा है। लग रहा है मैं आज सच्चे अर्थो में घरवाली हूँवर्ना तो शाम के समय पूरे घर में तुम्हारी ही आवाजें सुनाई देती हैं
स्नेह गोस्वामी
सुनती हो चाय बनाओजल्दी से  खाना लाओचादर नहीं झाडी अब तक भई! तुम तो सारा दिन सोयी रहती हो और अब आधी रात तक बर्तन बजाती रहोगी। अब दूध क्या एक बजे रात दोगी।’ पूरा दिन यही सब सुनते बीतता है। पर आज कितनी शान्ति है। आज मैंने शादी के बाद पहली बार अदरक डली चाय बनाई है। अब आराम से अपना मनपसन्द कोई नॉवल पढ़ना चाहती हूँ। तुम तो अपनी मीटिंग की फाइलों में उलझे होवोगेफिर भी बाय!
सुबह 10 बजे
सुनो जानूमीटिंग शुरू हो गई क्यापक्का हो गई होगी। मैंने भी मन्नू भंडारी का ‘आपका बंटी’ खत्म कर लिया। बेचारा बंटी! पर बंटी को बेचारा होने से बचाने के चक्कर में कितनी शकुन हर रोज़ बेचारी होती है। तुम मर्द कैसे समझोगे। खैर जाने दो। मैंने आज अपने लिए सैंडविच और पोहा बनायाचटखारे ले कर खाया। रोज-रोज आलू के परांठे खा के उब गयी थी। तुम तो कभी ऊबते ही नहीं परोंठों से। मन में संतुष्टि हो रही है। अब कुछ देर टी.वी. पर कोई सीरियल देखूंगी। जब तुम घर होते हो तब तो टी. वी. पर या तो न्यूज चलती हैं या फिर कोई मैचवह भी तब तक जब तक तुम्हारा मन करे वरना टी.वी. बंद। अरे कोई अच्छा सा सीरियल शुरू हो गया हैइसलिए बाय!
दोपहर 3 बजे
जानूआज मैंने कई दिनों बाद फिल्म देखी। लगा थाजिन्दगी मशीन हो गई है। पर नहीं दिल अभी धड़क रहा है। पुराणी फिल्म थी साहिब बीबी और गुलाम। मीना कुमारी छोटी बहू बनी हैगरीब घर की बेटी और बड़े जमींदार की पत्नी। पति को नाचने वाली से और शराब से फुर्सत नहीं। बीवी बेचारी सारी  जिन्दगी उसे खुश करने के चक्कर में पागल हुई रहती है। सुनो! ये हसबैंड लोगों को बाहर वालियां क्यों अच्छी लगती हैंबेशक कोई बाहर वाली घास भी न डालेपर ये लट्टू हुए आगे-पीछे घूमते रहेंगे। घरवाली को सिर्फ कामवाली बाई बनाए रर्क्खेगें। अरेआज सफाई तो की ही नहीं। चलोअब थोड़ी सफाई कर ली जायफिर खाना सोचूंगी। बाय!
शाम 7 बजे
जानू,  शाम को सफाई में ही तीन घंटे लग गए। आज मैंने घर रगड़-रगड़ कर साफ़ किया। एक-एक खिड़की दरवाजारोशनदान झाड़ कर चमकाये। इस घर पर सच में बहुत प्यार आया। फिर सारी चादरें बदलींसोफा-कवर बदले। पूरा घर अलग ही लुक दे रहा है। कपड़े धोने के लिए मशीन में डाले। फिर अपने लिए रोटी बनाई। सब्जी तो वही पड़ी थी जो रात तुम्हारे लिए बनाई थीउसी के साथ खा ली। अब कुछ देर गाने सुने जाएँ,  ठीक! बाय !
रात 11 बजे
सुनो जानूशाम को खाना तो बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ीं। खाया ही आठ बजे थापर कोफ़ी का एक कप बनाया। एक तुम्हारा भी बन गया था सो दोनों कप मुझे ही पीने पड़े। फिर सास-बहू के सीरियल देखे। बहुत दिनों से देखे नहीं थेंपर लगा नहीं कि एक साल बाद देखे। वही कहानीवही करेक्टरवही उनके षड्यन्त्र। फिर भी अच्छा समय बीत गया। अब सोने जा रही हूँ। अच्छा अब गुड नाईट!
रात दो बजे
सुनो जानू,  तुम तो सो चुके होवोगेपर मुझे नींद नहीं आ रही। तुम्हारे चीखने-चिल्लाने की आवाजें  सुबह से अब तक नहीं सुनी। शायद इसलिए या इस समय पूरे कमरे में गूँजते खर्राटो के बिना सोने की आदत नहीं रही इसलिए। कारण जो भी हो पर नींद तो सचमुच ही नहीं आ रही। इतना अच्छा दिन बीता फिर तो निश्चिंत हो कर सोना चाहिये था न,  फिर भी नहीं सोई। तुम से पूरी तरह से न जुड़ पाने के बावजूद तुम्हारे बिना नींद नहीं आ रही। पर तुम यह सब कैसे जानोगे। तुम खुद कभी ये समझोगे नहीं और मैं तो शायद कभी कह ही नहीं पाऊँगी। क्योंकि जब तुम घर में रहोगे तो यह घर तुम्हारा ही होगा.  तुम ही बोलोगेतुम ही हुक्म दोगे। मैं तो सिर्फ– ‘जीआई जीजी लाई जी,’ ही कह पाती हूँ। पर फिर भी तुम्हें मिस कर रही हूँ। अपनी मीटिंग जल्दी से खत्म करो और आ जाओ। मुझे नींद नहीं आ रही है। 

पढ़ी गयी सभी लघुकथाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी डॉ॰ अशोक भाटिया तथा डॉ॰ बलराम अग्रवाल द्वारा की गयी। उन्हें इन लिंक्स पर देख-सुन सकते हैं :                                                https://www.youtube.com/watch?v=mUv_WAdGIZs&app=desktop                                                      https://www.youtube.com/watch?v=Lb6k0h8Nc9s